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प्राचीन हिन्दू रीतिरिवाज़ों के पीछे का विज्ञान

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संपूर्ण ब्रह्माण्ड कुछ विज्ञान के नियमों के अनुसार चलता है। आज हम मानवों के साथ यही समस्या है। हमारे दुःख प्रकृति के द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक कानूनों का पालन करने में हमारी असमर्थता के कारण हैं।
हिन्दू धर्म दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म है जो पूरी तरह से प्रकृति के वैज्ञानिक नियमों पर आधारित है, इसी कारण विज्ञान और धर्म के बीच कभी कोई विवाद नहीं था। हालाँकि हमें इस बात की गलत समझ है कि हिन्दुवाद अवैज्ञानिक और अन्धविश्वास से परिपूर्ण है। यह अनुचित विचार हिन्दुओं में पश्चिम से आये लोगों के द्वारा डाला गया था क्योंकि वे एक ऐसे धर्म को समझने की कोशिश में थे जो उन्हें भगवान, प्रकृति और मानव के बारे में उनकी मानक धारणाओं से बिलकुल अलग लगा था। प्राचीन भारत के ऋषिओं को पता था कि भगवान, प्रकृति और मानव तीनों में कही भी कोई पृथकता(अलग) है ही नहीं, जैसा कि यहूदियों में माना जाता था। सनातम धर्म के नाम से जाना जाने वाला आज का हिन्दू धर्म जिसे ऋषिओं ने हमें दिया था, पूरी तरह से वैज्ञानिक मान्यताओं पर आधारित है।
हमारे ऋषि धर्म का प्रचार नहीं करते थे बल्कि जीवन जीने के एक ऐसे तरीके का प्रचार करते थे …

आखिर क्यों मनाये जाते हैं श्राद्ध? - Importance of Shraddh

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श्राद्ध पक्ष का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। प्राचीन सनातन धर्म के अनुसार हमारे पूर्वज देवतुल्य हैं और इस धरा पर हमने उन्हीं के द्वारा जीवन प्राप्त किया है तथा जिस प्रकार उन्होंने हमारा लालन-पालन कर हमें कृतार्थ किया है, उससे हम उनके ऋणी हैं। समर्पण और कृतज्ञता की इसी भावना से श्राद्ध पक्ष प्रेरित है, जो जातक को पितर ऋण से मुक्ति मार्ग दिखाता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार, समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।’

महाभारत के अनुसार, सबसे पहले महातप्सवी अत्रि ने महर्षि निमि को श्राद्ध के बारे में उपदेश दिया था। इसके बाद महर्षि निमि ने श्राद्ध करना शुरू कर दिया। महर्षि को देखकर अन्य श्रृषि-मुनि भी पितरों को अन्न देने लगे।
लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए।

'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से बना है, जो श्राद्ध का प्रथम अनिवा…

Bhagwan Shree Krishna Ko 56 Bhog Kyo Lagaya Jata Hai

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आखिर क्यों प्रभु श्रीकृष्ण को "56" भोग लगाया जाता है?
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण (Krishna) को "56" भोग का भोग लगाया जाता है परन्तु ऐसा होने के पीछे क्या कारण है? आखिर "56" भोग की इस परंपरा की शुरुआत कहाँ से हुई ?

त्रेतायुग के समय की बात है। स्वर्ग के अधिपति राजा इंद्र जो कि सभी देवताओं के राजा भी माने जाते हैं। मनुष्य तथा देवताओं के पुजनीय है। सभी के द्वारा इंद्र की पूजा बड़े धूमधाम से की जाती थी। क्योंकि लोगों का मानना था कि इंद्र ही सबसे बड़े देवता हैं और यदि इंद्र क्रोधित हुए तो धरती पर अल्पवृष्टि या अतिवृष्टि हो जायेगी। इसी डर के कारण सभी मनुष्य इंद्र से बहुत डरते थे और उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उनकी पूजा बड़े धूमधाम से की जाती थी। मनुष्यों के डर को इंद्र अपना सम्मान समझता था।

एक बार दीपावली के अगले दिन सभी वृन्दावनवासी इंद्र की पूजा की तैयारियों में व्यस्त थे। प्रभु श्रीकृष्ण (krishna) अपनी गैयाओं के साथ जंगल की और प्रस्थान कर रहे थे कि तभी यशोदा मैयां ने उन्हें कहा लाला पहले इंद्र की पूजा कर लो उसके बाद गइया चराने जाना प्रभु श्रीकृष्…

कैसे हुई गणेश पुराण की शुरुआत?

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गणेश पुराण भगवान् श्री गजानन के अनंत चरित्र को दर्शाता है। इसको सुनाने और सुनने वाले सभी का कल्याण होता है और श्री गणेश की कृपा बनी रहती है। श्री गणेश प्रथम पूज्य तो हैं ही, साथ ही विघ्नेश्वर भी कहे जाते हैं क्योंकि श्री गणेश अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर कर देते हैं। गणेश पुराण श्री गणेश जी की महिमाओं से जुड़ी बहुत सी बातें बताता है।
गणेश पुराण की उत्पत्ति के बारे में जानने से पहले महर्षि भृगु द्वारा राजा सोमकान्त को गणेश पुराण सुनाये जाने के बारे में जानना चाहिए।
राजा सोमकान्त सौराष्ट्र की राजधानी देवनगर के राजा था। वह वेदों, शस्त्र-विद्या आदि के ज्ञान से संपन्न था। उसने अपने पराक्रम के बल पर अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी। उसने अपनी प्रजा का पालन पुत्र की भांति किया था। उसकी पत्नी सुधर्मा पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली अति सूंदर तथा गुणवती स्त्री थी। राजा भी पत्नीव्रत धर्म का पालन करने वाला अति उत्तम पुरुष था।
जितना उत्तम राजा था उतना ही उत्तम उसका पुत्र था, जो सभी तरह की विद्याओं में निपुण और प्रजा के भले की सोचने वाला था। राजा का जीवन पूर्ण सुखी और सम्माननीय था। परन्तु युवावस्था …

भगवान श्री गणेश जी प्रथम पूज्य क्यों है ? (God Ganesh)

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प्राचीन काल की बात है - नैमिषारण्य क्षेत्र में ऋषि-महर्षि साधु-संतों का समाज जुड़ा था। उसमें श्रीसूतजी भी विद्यमान थे। शौनक जी ने उनकी सेवा में उपस्थित होकर निवेदन किया कि "हे अज्ञान रूप घोर तिमिर को नष्ट करने में करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान श्रीसूतजी ! हमारे कानों के लिए अमृत के समान जीवन प्रदान करने वाले कथा तत्व का वर्णन कीजिये। हे सूतजी ! हमारे हृदयों में ज्ञान के प्रकाश की वृद्धि तथा भक्ति, वैराग्य और विवेक की उत्पत्ति जिस कथा से हो सकती हो, वह हमारे प्रति कहने कि कृपा करें।"
शौनक जी की जिज्ञासा से सूतजी बड़े प्रसन्न हुए। पुरातन इतिहासों के स्मरण से उनका शरीर पुलकायमान हो रहा था। वे कुछ देर उसी स्थिति में विराजमान रहकर कुछ विचार करते रहे और अंत में बोले - "शौनक जी ! इस विषय में आपके चित में बड़ी जिज्ञासा है। आप धन्य हैं जो सदैव ज्ञान की प्राप्ति में तत्पर रहते हुए विभिन्न पुराण-कथाओं की जिज्ञासा रखते हैं। आज मैं आपको ज्ञान के परम स्तोत्र श्री गणेश जी का जन्म-कर्म रूप चरित्र सुनाऊँगा। गणेशजी से ही सभी ज्ञानों, सभी विद्याओं का उदभव हुआ है। अब आप सावधान चित्त से वि…

आखिर क्या है पंच कैलाश?

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हमारे भारत और तिब्बत में स्थित 5 अलग-अलग कैलाश पर्वत हैं जिन्हें सम्मिलित रूप से पंच कैलाश नाम दिया गया है। शिव भक्तों के लिए मोक्ष प्राप्ति हेतु पंच कैलाश यात्रा को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। सभी 5 कैलाश हिमलाय पर्वतश्रृंखला में स्थित हैं। अधिकांश यात्री पंच कैलाश यात्रा को सत्य की यात्रा और एक महान आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव मानते हैं। आइये पंच कैलाश यात्रा में सम्मिलित कैलाश पर्वतों के बारे में संक्षिप्त में जानते हैं।
1. आदि कैलाश (छोटा कैलाश) आदि कैलाश (छोटा कैलाश) भारत तिब्बत सीमा के बिलकुल पास भारतीय सीमा क्षेत्र के अंदर स्थित है। छोटा कैलाश उत्तराखंड के धारचूला जिले में स्थित है। यह क्षेत्र उत्तम प्राकृतिक सुंदरता, शांति और सम्प्रभुता से भरा पूरा है। यह क्षेत्र बहुत ही शांत है, शांति की तलाश कर रहे यात्रियों के लिए यह स्थान अति उत्तम साबित होता है। बहुत से लोग एक सामान रूप के चलते आदि कैलाश और मुख्य कैलाश में भ्रमित हो जातें हैं। आदि कैलाश के समीप एक झील स्थित है जिसे "पार्वती ताल" कहा जाता है।
2. किन्नौर कैलाश किन्नौर कैलाश हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की कि…

भगवान दत्तात्रेय से जुड़ी कुछ खास बातें।

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हिन्दू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों का एक रूप माना गया है। धर्मग्रंथों (पुराणों) के अनुसार भगवान दत्तात्रेय विष्णु के छठे अवतार कहे जाते हैं। वह सर्वव्यापी कहलाये क्योंकि वह आजन्म ब्रह्मचारी  और एक सन्यासी रहे थे। इसी कारण से तीनों ईश्वरीय शक्ति के रूप भगवान दत्तात्रेय की आराधना बहुत सफल, सुखदायी और तुरंत फलदायी मानी जाती है। मन, कर्म और वाणी से की गयी इनकी उपासना भक्त को हर तरह की कठिनाइयों से मुक्ति दिलाती है।
ऐसा कहा जाता है कि भगवान भोले (शिव) का साक्षात् रूप दत्तात्रेय में मिलता है। जब वैदिक कर्मों का, धर्म का और वर्ण व्यवस्था का लोप हो गया था, तब भगवान दत्तात्रेय ने सबका पुनरुद्धार किया था। कृतवीर्य के बड़े पुत्र अर्जुन ने अपनी सेवाओं से इन्हें प्रसन्न कर चार वर प्राप्त किये थे।
पहला: बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, आदोषदर्शी तथा सहभुजाओं वाला बनने का। दूसरा: जरायुज और अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का। तीसरा: देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का। चौथा: इहलोक (पृथ्वीलोक), स्वर्गलोक…