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जब भगवान राम ने भक्त के लिए बनाई रसोई |

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बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं। लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं

गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी
आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा ...

अब आनंद महाराज के आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो। महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।

उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो .... हम नहीं…

मृत्यु से भय कैसा ?

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राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ।
अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।
"राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा  पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी।
"जंगल में सिंह, भेड़िये आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।"
रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बंजारे की झोंपड़ी देखी । वह बंजारा ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयु…

आखिर क्यों महर्षि दुर्वासा ने इन्द्र को लक्ष्मीहीन होने का श्राप दिया

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एक बार भगवान शंकर के अंशभूत महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमत-घूमते वे एक मनोहर वन में गए। वहाँ एक विद्याधर नाम की स्त्री अपने हाथ में पारिजात पुष्पों की माला लिए खड़ी थी, वह माला दिव्य पुष्पों की बनी थी। उसकी दिव्य गंध से समस्त वन-प्रांत सुवासित हो रहा था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला माँगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।
इसी समय मुनि को देवराज इंद्र दिखाई दिए, जो मतवाले ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत-से देवता भी थे। मुनि ने अपने मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौरे गुंजार कर रहे थे। जब देवराज इंद्र समीप आए तो दुर्वासा ने पागलों की तरह वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज इंद्र ने उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूँड से माला उतार ली और सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और देवराज इंद्र से इस प्रकार बोले, ''अरे ओ इंद्र! ऐश्वर्य के घमंड से तेरा ह्रदय दूषित हो गय…

श्री राम के अलावा इन 5 से भी हार गया था रावण |

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बालि से रावण की हार एक बार रावण बालि से युद्ध करने के लिए पहुँच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकारने लगा, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न होने लगी।रावण के ऐसा बार-बार करने पर बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा पूर्ण की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से अपने आप को आजाद नहीं करा पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था।
सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो उसने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। उसने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और फिर पानी को छोड़ दिया, जिससे रावण और उसकी पूरी सेना नर्मदा के बहाव …

कृष्ण का नाम कृष्ण ही क्यों पड़ा।

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एक दिन वासुदेव प्रेरणा से कुल पुरोहित गर्गाचार्यजी गोकुल पधारे। नन्दबाबा और यशोदाजी ने गर्गाचार्यजी का बड़ा आदर-सत्कार किया और वासुदेव और देवकीजी की कंस कारागृह में स्थिति को जाना, और तत्पश्चात जब नन्दबाबा ने गर्गाचार्यजी से आने का कारण पूछा तो गर्गाचार्यजी ने बतलाया कि पास के गांव में एक बालक ने जन्म लिया है। मैं उस बालक के नामकरण के लिए जा रहा हूँ। इसी रास्ते में आपका घर भी पड़ता है सो मैं आपसे मिलने को आया हूँ। यह सुन कर नन्द-यशोदा ने अनुरोध किया कि बाबा हमारे यहाँ भी दो बालकों ने जन्म लिया है आप कृपया उनका भी नामकरण करने कि कृपा करे।
गर्गाचार्यजी ने इस कार्य को करने में असमर्थता जताई और कहा की आपको हर कार्य जोर शोर से करने की आदत है। अगर कंस को इस बात कि जानकारी हो गयी तो मेरा जीना मुहाल हो जाएगा। नन्द बाबा कहने लगे भगवन आप इस कार्य को गौशाला में निर्विघ्न रूप से आयोजित कर सकते है तथा इस कार्य की किसी को जानकारी भी नहीं हो पाएगी। गर्गाचार्यजी तैयार हो गये। जब रोहिणी ने सुना कि कुल-पुरोहित आए हैं वे उनका गुणगान बखान करने लगी। यशोदाजी ने कहा कि गर्गाचार्यजी इतने बड़े पुरोहित हैं तो …

कैसे तोडा भगवान् ने अहंकार अपने भक्तो का |

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अहंकार व्यक्ति के विवेक (सोचने-समझने की शक्ति) का नाश कर देता है। सतयुग से लेकर द्वापर तक जब भी किसी ने अपना विवेक खोया तब-तब उसका सर्वनाश ही हुआ जैसे- रावण, दुर्योधन, पर यही अहंकार जब भगवान् के भक्तो को घेरता है तो भगवान् स्वयं उनका अहंकार तोड़ते है। इसी अहंकार से जुडी एक रोचक कथा आज हम आपके समक्ष लेकर आये है।  
एक बार भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। श्रीकृष्ण के निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी विराजमान थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु ! आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या सीता मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं ? द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरूड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है ? इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि, हे प्रभु ! मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है ?
भगवान मन ही मन म…

भगवान् का नाम

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सनातन धर्म में भगवद नाम का सुमिरन सर्वोपरि बताया गया है। बड़े-बड़े संत-महात्माओ ने ईश्वर की प्राप्ति भगवद नाम से की है, तथा उन्होंने अपने जीवन-काल में सभी को इसके लिए प्रोत्साहित भी किया है। इसी भगवद नाम की महिमा से जुडी एक रोचक कहानी आज हम आप सब के सामने लेकर आये है।
पुराने समय की बात है। श्याम नाम का एक व्यक्ति सब्जी बेचने गाँव गाँव जाया करता था। वह सब्जी बेचते समय सभी को भगवान् कहकर बुलाया करता था। जैसे उससे अगर कोई पूछता- भैया आलू कैसे दिए ? तो वह कहता भगवन आलू 20 रूपये किलो है। उससे कोई पूछता गाजर कैसे दी ? तो वह कहता भगवन गाजर 30 रूपये किलो है। अगर कोई पूछता धनिया कैसे दिया तो वह कहता भगवन एकदम ताजा धनिया है मात्र 10 रूपये किलो। भगवान् नाम मानो उसकी जुबान पर हर वक़्त ही रहता था।
वह सबको भगवान् नाम से ही पुकारता था। इसलिए सभी लोग उसे भी भगवान् नाम से ही पुकारने लगे। उसे भगवान् कहना और सुनना बहुत अच्छा लगता था। वही गांव की एक औरत भगवान् की पूजा में दिन-रात लगी रहती थी। उस औरत को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। उसे लगता था जैसे वह भगवान् का अपमान कर रहा है।
एक दिन उस औरत ने सब्जी वाले को …