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अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है

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न क्षयति इति अक्षय” अर्थात जिसका कभी क्षय न हो उसे अक्षय कहते हैं और वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। इसी दिन भगवान परशुराम का जन्म होने के कारण इस दिन परशुराम जयन्ती मनाई जाती है। अक्षय तृतीया के दिन गंगा-स्नान करने एवं भगवान श्री कृष्ण को चन्दन लगाने की परम्परा है। मान्यता है कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखण्ड रहता है। इस दिन माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए विशेष अनुष्ठान करने तथा "श्री सूक्त" के पाठ के साथ हवन करने का भी विधान है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन माँ लक्ष्मी की पूजा करने से माँ अवश्य ही कृपा करती है जातक को अक्षय पुण्य के साथ उसका जीवन धन-धान्य से भर जाता है। 
जानिए क्या है अक्षय तृतीया का महत्व, 
अक्षय तृतीया क्यों मनाई जाती है,
*अक्षय तृतीया के दिन क्या करें,* जो मनुष्य इस दिन गंगा स्नान/ पवित्र नदियों में स्नान करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यदि घर पर ही स्नान करना पड़े तो सूर्य उदय से पूर्व उठ कर एक बाल्टी में जल भर कर उस में गंगा जल मिला कर स्नान करना चाहिए। इस दिन भगवान श्रीकृष्…

साधुता से लालच पर विजय

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कुछ समय पूर्व एक बहुत ही पहुंचे हुए महात्मा हिमालय की तलहटी में निवास करते थे। अपने गुरु की आज्ञा से वे गाँव-गाँव में घूमकर अपने ज्ञान की गंगा पुरे देश में प्रवाहित कर रहे थे। वे किसी भी गाँव में अपना डेरा डालते और फिर वहाँ के लोगो में ज्ञान-रूपी गंगा का समावेश करते और अगले गाँव की और निकल पड़ते।
एक बार महात्मा घूमते-घूमते एक शहर के पास पहुंचे। लेकिन रात हो जाने के कारण शहर का दरवाज़ा बन्द हो गया था। महात्मा ने रात वही व्यतीत करके सुबह-सवेरे शहर में प्रवेश करने का विचार किया और वही दरवाज़े के पास बिछोना बिछाकर लेट गए।
उसी रात लम्बी बीमारी के चलते उस राज्य के राजा की मृत्यु हो गई। राजा के कोई संतान नहीं थी। इसीलिए राजगद्दी पर बैठने के लिए पूरा राज-परिवार झगड़ने लगा। सभी राजा के सिंहासन पर अपना अधिकार जताने लगे। राजगद्दी के लिए होने वाले झगडे का कोई हल न निकलते देख राज-दरबारियों ने एक अनोखा निर्णय लिया।
राज-दरबारियों ने सर्व-सहमति से यह निर्णय लिया की अगले दिन सुबह शहर का दरवाजा खुलने पर जो व्यक्ति सबसे पहले शहर के अन्दर कदम रखेगा उसी को राज्य का राजा घोषित कर दिया जाएगा। सभी ने राज-दरबारि…

भगवती तुलसी - Hindi Spiritual & Religious Story

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तुलसी से जुडी एक कथा बहुत प्रचलित है श्रीमद देवी भगवत पुराण में इनके अवतरण की दिव्य लीला कथा भी बताई गयी है !
एक बार महादेव शिव ने अपने तेज को समुन्द्र में फेंक दिया था, उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया ! यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना और उसने अपनी राजधानी का नाम जालंधर नगरी रखा था !
दैत्य राज कालनेमि की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ ! जालंधर महाराक्षस था अपनी सत्ता से मद में चूर था ! एक दिन उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया , परन्तु समुन्द्र से ही उतपन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया ! 
वहाँ से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया ! भगवान् देवाधिदेव शिव का ही रूप धरकर माता पार्वती के समीप गया , परन्तु माँ ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहाँ से अंतर्ध्यान हो गयी ! देवी पार्वती ने क्रोधित होकर सारा वृतांत भगवान् विष्णुं को सुनाया,  परन्तु जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यंत पतिव्रता स्त्री  थी,  उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित…

गिलहरी का योगदान-Spiritual Story in Hindi

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यह कहानी उस समय की है जब भगवान् श्री राम (Ram) माता सीता को पापी रावण (Ravan) के बंधन से छुड़ाने के लिए लंका तक जाने के लिए समुन्द्र के बिच एक सेतु का निर्माण कर रहे थे| माता  सीता तक पहुँचने वाले इस सेतु  के निर्माण में महाबली वीर हनुमान और उनकी पूरी वानर सेना लगी थी| महावीर हनुमान और उनकी पूरी वानर सेना बड़े-बड़े पत्थरों पर “श्री राम” नाम लिखकर समुन्द्र में रख देते और सेतु  का निर्माण करने लगे | तभी भगवान् श्री राम की नज़र उस  गिलहरी पर पड़ी, जो पहले समुद्र किनारे पड़ी धुल पर लोट कर धुल अपने शरीर पर चिपका लेती और फिर पुल पर आकर झिटक देती| वह लगातार इस काम को करती जा रही थी| काफी देर तक उस गिलहरी को ऐसा करते देख भगवान्  राम उस गिलहरी के पास गए और गिलहरी को प्यार से अपने हाथों से उठा कर बोले- यह तुम क्या कर रही हो| गिलहरी ने भगवान् श्री राम को प्रणाम किया और बोली- महाबली वीर बजरंग बलि हनुमान और उनकी पूरी सेना बड़े-बड़े पत्थरों से इस पुल का निर्माण कर रही
हैं, लेकिन में छोटी सी गिलहरी यह सब नहीं कर सकती इसिलिए मुझसे जितना बन पड रहा है में वो कर रही हूँ|में भी इस काम मे अपना छोटा सा योगदान देना…

महाभारत के युद्ध में भोजन प्रबंधन |

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महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्योंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।  आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। श्रीबलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।  कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य। जब उडुपी के राजा अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुँचे तो कौरव और पांडव दोनों उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न करने लगे।  उडुपी के राजा अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा - "हे माधव ! दोनों ओर से जिसे भी देखो युद्ध के लिए लालायित दिखता है किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनों ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा ? इस पर श्रीकृष्ण ने कहा - महाराज ! आपने बिलकुल उचित सोचा है। आपके इस बात को छेड़ने पर मुझे प्रतीत होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृपया बताएं।  इसपर उडुपी नरेश ने कहा - "हे वासुदे…

जब भगवान राम ने भक्त के लिए बनाई रसोई |

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बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं। लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं

गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी
आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा ...

अब आनंद महाराज के आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो। महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।

उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो .... हम नहीं…

मृत्यु से भय कैसा ?

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राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ।
अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।
"राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा  पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी।
"जंगल में सिंह, भेड़िये आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।"
रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बंजारे की झोंपड़ी देखी । वह बंजारा ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयु…