Posts

Featured Post

दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने की परम्परा क्यों हैं।

Image
हमारे समाज में बहुत से ऐसे रीती-रिवाज़ है जिन्हे हम सभी ने अपने जीवन में देखा है, ऐसा ही एक रिवाज़ है मंदिर से निकलते समय मदिर की पेड़ी या सीढ़ी पर बैठना । आइये जानते है की इसके पीछे क्या कारन है।
आपने बड़े बुजुर्ग को कहते और करते देखा होगा कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाते है तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं ।
आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई थी। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं । आप इस श्लोक को पढ़े और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताए । यह श्लोक इस प्रकार है -
अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम् ।।
इस श्लोक का अर्थ है "अनायासेन मरणम्" अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर ना पड़े, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाए ।
"बिना देन्येन जीवनम्" अर्थात…

देवउठनी एकादशी 2019 : तुलसी, गंडकी नदी और शालिग्राम की पौराणिक कथा

Image
शिव महापुराण के अनुसार पौराणिक समय में दैत्यों के वंश में दंभ नाम का एक राजा हुआ। वह बहुत बड़ा विष्णु भक्त था। कई सालों तक उसके यहां संतान नही होने के कारण उसने दैत्य गुरु शुक्राचार्य को अपना गुरु बनाकर उनसे श्री कृष्ण मन्त्र प्राप्त किया। मन्त्र प्राप्त करके उसने पुष्कर सरोवर में घोर तपस्या की। भगवान विष्णु उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे संतान प्राप्ति का वरदान दे दिया।
भगवान विष्णु के वरदान से राजा दंभ के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया। इस पुत्र का नाम शंखचूड़ रखा गया। शंखचूड़ ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए पुष्कर में घोर तपस्या की।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब शंखचूड़ ने वरदान मांगा कि वह हमेशा अजर-अमर रहे व कोई भी देवता उसे कोई हानि ना पहुँचा पाए। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया और कहा कि वह बदरीवन जाकर धर्मध्वज की पुत्री तुलसी जो तपस्या कर रही है उससे विवाह कर लें। शंखचूड़ ने वैसा ही किया और तुलसी के साथ विवाह के बाद सुखपूर्वक रहने लगा।
उसने अपने बल से देवताओं, असुरों, दानवों, राक्षसों, गंधर्वों, नागों, किन्नरों, मनुष्यों तथा त्रिलोक…

प्राचीन हिन्दू रीतिरिवाज़ों के पीछे का विज्ञान

Image
संपूर्ण ब्रह्माण्ड कुछ विज्ञान के नियमों के अनुसार चलता है। आज हम मानवों के साथ यही समस्या है। हमारे दुःख प्रकृति के द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक कानूनों का पालन करने में हमारी असमर्थता के कारण हैं।
हिन्दू धर्म दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म है जो पूरी तरह से प्रकृति के वैज्ञानिक नियमों पर आधारित है, इसी कारण विज्ञान और धर्म के बीच कभी कोई विवाद नहीं था। हालाँकि हमें इस बात की गलत समझ है कि हिन्दुवाद अवैज्ञानिक और अन्धविश्वास से परिपूर्ण है। यह अनुचित विचार हिन्दुओं में पश्चिम से आये लोगों के द्वारा डाला गया था क्योंकि वे एक ऐसे धर्म को समझने की कोशिश में थे जो उन्हें भगवान, प्रकृति और मानव के बारे में उनकी मानक धारणाओं से बिलकुल अलग लगा था। प्राचीन भारत के ऋषिओं को पता था कि भगवान, प्रकृति और मानव तीनों में कही भी कोई पृथकता(अलग) है ही नहीं, जैसा कि यहूदियों में माना जाता था। सनातम धर्म के नाम से जाना जाने वाला आज का हिन्दू धर्म जिसे ऋषिओं ने हमें दिया था, पूरी तरह से वैज्ञानिक मान्यताओं पर आधारित है।
हमारे ऋषि धर्म का प्रचार नहीं करते थे बल्कि जीवन जीने के एक ऐसे तरीके का प्रचार करते थे …

आखिर क्यों मनाये जाते हैं श्राद्ध? - Importance of Shraddh

Image
श्राद्ध पक्ष का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। प्राचीन सनातन धर्म के अनुसार हमारे पूर्वज देवतुल्य हैं और इस धरा पर हमने उन्हीं के द्वारा जीवन प्राप्त किया है तथा जिस प्रकार उन्होंने हमारा लालन-पालन कर हमें कृतार्थ किया है, उससे हम उनके ऋणी हैं। समर्पण और कृतज्ञता की इसी भावना से श्राद्ध पक्ष प्रेरित है, जो जातक को पितर ऋण से मुक्ति मार्ग दिखाता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार, समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।’

महाभारत के अनुसार, सबसे पहले महातप्सवी अत्रि ने महर्षि निमि को श्राद्ध के बारे में उपदेश दिया था। इसके बाद महर्षि निमि ने श्राद्ध करना शुरू कर दिया। महर्षि को देखकर अन्य श्रृषि-मुनि भी पितरों को अन्न देने लगे।
लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए।

'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से बना है, जो श्राद्ध का प्रथम अनिवा…

Bhagwan Shree Krishna Ko 56 Bhog Kyo Lagaya Jata Hai

Image
आखिर क्यों प्रभु श्रीकृष्ण को "56" भोग लगाया जाता है?
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण (Krishna) को "56" भोग का भोग लगाया जाता है परन्तु ऐसा होने के पीछे क्या कारण है? आखिर "56" भोग की इस परंपरा की शुरुआत कहाँ से हुई ?

त्रेतायुग के समय की बात है। स्वर्ग के अधिपति राजा इंद्र जो कि सभी देवताओं के राजा भी माने जाते हैं। मनुष्य तथा देवताओं के पुजनीय है। सभी के द्वारा इंद्र की पूजा बड़े धूमधाम से की जाती थी। क्योंकि लोगों का मानना था कि इंद्र ही सबसे बड़े देवता हैं और यदि इंद्र क्रोधित हुए तो धरती पर अल्पवृष्टि या अतिवृष्टि हो जायेगी। इसी डर के कारण सभी मनुष्य इंद्र से बहुत डरते थे और उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उनकी पूजा बड़े धूमधाम से की जाती थी। मनुष्यों के डर को इंद्र अपना सम्मान समझता था।

एक बार दीपावली के अगले दिन सभी वृन्दावनवासी इंद्र की पूजा की तैयारियों में व्यस्त थे। प्रभु श्रीकृष्ण (krishna) अपनी गैयाओं के साथ जंगल की और प्रस्थान कर रहे थे कि तभी यशोदा मैयां ने उन्हें कहा लाला पहले इंद्र की पूजा कर लो उसके बाद गइया चराने जाना प्रभु श्रीकृष्…

कैसे हुई गणेश पुराण की शुरुआत?

Image
गणेश पुराण भगवान् श्री गजानन के अनंत चरित्र को दर्शाता है। इसको सुनाने और सुनने वाले सभी का कल्याण होता है और श्री गणेश की कृपा बनी रहती है। श्री गणेश प्रथम पूज्य तो हैं ही, साथ ही विघ्नेश्वर भी कहे जाते हैं क्योंकि श्री गणेश अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर कर देते हैं। गणेश पुराण श्री गणेश जी की महिमाओं से जुड़ी बहुत सी बातें बताता है।
गणेश पुराण की उत्पत्ति के बारे में जानने से पहले महर्षि भृगु द्वारा राजा सोमकान्त को गणेश पुराण सुनाये जाने के बारे में जानना चाहिए।
राजा सोमकान्त सौराष्ट्र की राजधानी देवनगर के राजा था। वह वेदों, शस्त्र-विद्या आदि के ज्ञान से संपन्न था। उसने अपने पराक्रम के बल पर अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी। उसने अपनी प्रजा का पालन पुत्र की भांति किया था। उसकी पत्नी सुधर्मा पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली अति सूंदर तथा गुणवती स्त्री थी। राजा भी पत्नीव्रत धर्म का पालन करने वाला अति उत्तम पुरुष था।
जितना उत्तम राजा था उतना ही उत्तम उसका पुत्र था, जो सभी तरह की विद्याओं में निपुण और प्रजा के भले की सोचने वाला था। राजा का जीवन पूर्ण सुखी और सम्माननीय था। परन्तु युवावस्था …

भगवान श्री गणेश जी प्रथम पूज्य क्यों है ? (God Ganesh)

Image
प्राचीन काल की बात है - नैमिषारण्य क्षेत्र में ऋषि-महर्षि साधु-संतों का समाज जुड़ा था। उसमें श्रीसूतजी भी विद्यमान थे। शौनक जी ने उनकी सेवा में उपस्थित होकर निवेदन किया कि "हे अज्ञान रूप घोर तिमिर को नष्ट करने में करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान श्रीसूतजी ! हमारे कानों के लिए अमृत के समान जीवन प्रदान करने वाले कथा तत्व का वर्णन कीजिये। हे सूतजी ! हमारे हृदयों में ज्ञान के प्रकाश की वृद्धि तथा भक्ति, वैराग्य और विवेक की उत्पत्ति जिस कथा से हो सकती हो, वह हमारे प्रति कहने कि कृपा करें।"
शौनक जी की जिज्ञासा से सूतजी बड़े प्रसन्न हुए। पुरातन इतिहासों के स्मरण से उनका शरीर पुलकायमान हो रहा था। वे कुछ देर उसी स्थिति में विराजमान रहकर कुछ विचार करते रहे और अंत में बोले - "शौनक जी ! इस विषय में आपके चित में बड़ी जिज्ञासा है। आप धन्य हैं जो सदैव ज्ञान की प्राप्ति में तत्पर रहते हुए विभिन्न पुराण-कथाओं की जिज्ञासा रखते हैं। आज मैं आपको ज्ञान के परम स्तोत्र श्री गणेश जी का जन्म-कर्म रूप चरित्र सुनाऊँगा। गणेशजी से ही सभी ज्ञानों, सभी विद्याओं का उदभव हुआ है। अब आप सावधान चित्त से वि…