Posts

Featured Post

आखिर क्यों महर्षि दुर्वासा ने इन्द्र को लक्ष्मीहीन होने का श्राप दिया

Image
एक बार भगवान शंकर के अंशभूत महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमत-घूमते वे एक मनोहर वन में गए। वहाँ एक विद्याधर नाम की स्त्री अपने हाथ में पारिजात पुष्पों की माला लिए खड़ी थी, वह माला दिव्य पुष्पों की बनी थी। उसकी दिव्य गंध से समस्त वन-प्रांत सुवासित हो रहा था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला माँगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।
इसी समय मुनि को देवराज इंद्र दिखाई दिए, जो मतवाले ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत-से देवता भी थे। मुनि ने अपने मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौरे गुंजार कर रहे थे। जब देवराज इंद्र समीप आए तो दुर्वासा ने पागलों की तरह वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज इंद्र ने उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूँड से माला उतार ली और सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और देवराज इंद्र से इस प्रकार बोले, ''अरे ओ इंद्र! ऐश्वर्य के घमंड से तेरा ह्रदय दूषित हो गय…

श्री राम के अलावा इन 5 से भी हार गया था रावण |

Image
बालि से रावण की हार एक बार रावण बालि से युद्ध करने के लिए पहुँच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकारने लगा, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न होने लगी।रावण के ऐसा बार-बार करने पर बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा पूर्ण की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से अपने आप को आजाद नहीं करा पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था।
सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो उसने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। उसने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और फिर पानी को छोड़ दिया, जिससे रावण और उसकी पूरी सेना नर्मदा के बहाव …

कृष्ण का नाम कृष्ण ही क्यों पड़ा।

Image
एक दिन वासुदेव प्रेरणा से कुल पुरोहित गर्गाचार्यजी गोकुल पधारे। नन्दबाबा और यशोदाजी ने गर्गाचार्यजी का बड़ा आदर-सत्कार किया और वासुदेव और देवकीजी की कंस कारागृह में स्थिति को जाना, और तत्पश्चात जब नन्दबाबा ने गर्गाचार्यजी से आने का कारण पूछा तो गर्गाचार्यजी ने बतलाया कि पास के गांव में एक बालक ने जन्म लिया है। मैं उस बालक के नामकरण के लिए जा रहा हूँ। इसी रास्ते में आपका घर भी पड़ता है सो मैं आपसे मिलने को आया हूँ। यह सुन कर नन्द-यशोदा ने अनुरोध किया कि बाबा हमारे यहाँ भी दो बालकों ने जन्म लिया है आप कृपया उनका भी नामकरण करने कि कृपा करे।
गर्गाचार्यजी ने इस कार्य को करने में असमर्थता जताई और कहा की आपको हर कार्य जोर शोर से करने की आदत है। अगर कंस को इस बात कि जानकारी हो गयी तो मेरा जीना मुहाल हो जाएगा। नन्द बाबा कहने लगे भगवन आप इस कार्य को गौशाला में निर्विघ्न रूप से आयोजित कर सकते है तथा इस कार्य की किसी को जानकारी भी नहीं हो पाएगी। गर्गाचार्यजी तैयार हो गये। जब रोहिणी ने सुना कि कुल-पुरोहित आए हैं वे उनका गुणगान बखान करने लगी। यशोदाजी ने कहा कि गर्गाचार्यजी इतने बड़े पुरोहित हैं तो …

कैसे तोडा भगवान् ने अहंकार अपने भक्तो का |

Image
अहंकार व्यक्ति के विवेक (सोचने-समझने की शक्ति) का नाश कर देता है। सतयुग से लेकर द्वापर तक जब भी किसी ने अपना विवेक खोया तब-तब उसका सर्वनाश ही हुआ जैसे- रावण, दुर्योधन, पर यही अहंकार जब भगवान् के भक्तो को घेरता है तो भगवान् स्वयं उनका अहंकार तोड़ते है। इसी अहंकार से जुडी एक रोचक कथा आज हम आपके समक्ष लेकर आये है।  
एक बार भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। श्रीकृष्ण के निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी विराजमान थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु ! आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या सीता मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं ? द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरूड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है ? इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि, हे प्रभु ! मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है ?
भगवान मन ही मन म…

भगवान् का नाम

Image
सनातन धर्म में भगवद नाम का सुमिरन सर्वोपरि बताया गया है। बड़े-बड़े संत-महात्माओ ने ईश्वर की प्राप्ति भगवद नाम से की है, तथा उन्होंने अपने जीवन-काल में सभी को इसके लिए प्रोत्साहित भी किया है। इसी भगवद नाम की महिमा से जुडी एक रोचक कहानी आज हम आप सब के सामने लेकर आये है।
पुराने समय की बात है। श्याम नाम का एक व्यक्ति सब्जी बेचने गाँव गाँव जाया करता था। वह सब्जी बेचते समय सभी को भगवान् कहकर बुलाया करता था। जैसे उससे अगर कोई पूछता- भैया आलू कैसे दिए ? तो वह कहता भगवन आलू 20 रूपये किलो है। उससे कोई पूछता गाजर कैसे दी ? तो वह कहता भगवन गाजर 30 रूपये किलो है। अगर कोई पूछता धनिया कैसे दिया तो वह कहता भगवन एकदम ताजा धनिया है मात्र 10 रूपये किलो। भगवान् नाम मानो उसकी जुबान पर हर वक़्त ही रहता था।
वह सबको भगवान् नाम से ही पुकारता था। इसलिए सभी लोग उसे भी भगवान् नाम से ही पुकारने लगे। उसे भगवान् कहना और सुनना बहुत अच्छा लगता था। वही गांव की एक औरत भगवान् की पूजा में दिन-रात लगी रहती थी। उस औरत को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। उसे लगता था जैसे वह भगवान् का अपमान कर रहा है।
एक दिन उस औरत ने सब्जी वाले को …

धनतेरस का महत्त्व

Image
एक समय भगवान श्रीहरि मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे, लक्ष्मीजी ने भी साथ चलने का आग्रह किया। श्रीहरि बोले- ' यदि मैं जो बात कहूं, वैसे ही मानो, तो चलो।' लक्ष्मी जी ने स्वीकार किया और भगवान श्रीहरि, लक्ष्मीजी सहित भूमण्डल पर आए। कुछ देर बाद एक स्थान पर भगवान श्रीहरि माता लक्ष्मी से बोले-' जब तक मैं न आऊं, तुम यहाँ ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ, तुम उधर मत देखना।'
भगवान् श्रीहरी के जाने पर माता लक्ष्मी को कौतुक उत्पन्न हुआ कि आख़िर दक्षिण दिशा में क्या है जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं दक्षिण में क्यों गए, कोई रहस्य ज़रूर है। माता लक्ष्मी से रहा न गया, ज्योंही भगवान ने राह पकड़ी, त्योंही माता लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही दूर पर सरसों का खेत दिखाई दिया। उस खेत में फसल लहलहा रही थी। वे उधर की ओर ही चल पड़ी। सरसों की शोभा से वे मन्त्रमुग्ध हो गईं और उसके फूल तोड़कर अपना शृंगार किया और आगे चलीं। आगे गन्ने (ईख) का खेत था। माता लक्ष्मी ने चार गन्ने लिए और रस चूसने लगीं।
उसी क्षण श्रीहरि भी वहां आ गए और यह देख माता लक्ष्मी पर नाराज़ होकर श्रा…

भगवान् शिव की उत्पत्ति कैसे हुई ?

Image
वेद कहते हैं कि जो जन्मा है, वह मरेगा अर्थात जो बना है, वह फना है। वेदों के अनुसार ईश्वर या परमात्मा अजन्मा, अप्रकट, निराकार, निर्गुण और निर्विकार है। अजन्मा का अर्थ जिसने कभी जन्म नहीं लिया और जो आगे भी जन्म नहीं लेगा। प्रकट अर्थात जो किसी भी गर्भ से उत्पन्न न होकर स्वयंभू प्रकट हो गया है और अप्रकट अर्थात जो स्वयंभू प्रकट भी नहीं है। निराकार अर्थात जिसका कोई आकार नहीं है, निर्गुण अर्थात जिसमें किसी भी प्रकार का कोई गुण नहीं है, निर्विकार अर्थात जिसमें किसी भी प्रकार का कोई विकार या दोष भी नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि फिर शिव क्या है? वे किसी न किसी रूप में जन्मे या प्रकट हुए तभी तो उन्होंने विवाह किया। तभी तो उन्होंने कई असुरों को वरदान दिया और कई असुरों का वध भी किया। दरअसल, जब हम 'शिव' कहते हैं तो वह निराकर ईश्वर की बात होती है और जब हम 'सदाशिव' कहते हैं तो ईश्वर महान आत्मा की बात होती है और जब हम शंकर या महेश कहते हैं तो वह सती या पार्वती के पति महादेव की बात होती है। बस, हिन्दूजन यहीं भेद नहीं कर पाते हैं और सभी को एक ही मान लेते हैं। अक्सर भगवान शंकर को शिव भी…