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गिलहरी का योगदान-Spiritual Story in Hindi

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यह कहानी उस समय की है जब भगवान् श्री राम (Ram) माता सीता को पापी रावण (Ravan) के बंधन से छुड़ाने के लिए लंका तक जाने के लिए समुन्द्र के बिच एक सेतु का निर्माण कर रहे थे| माता  सीता तक पहुँचने वाले इस सेतु  के निर्माण में महाबली वीर हनुमान और उनकी पूरी वानर सेना लगी थी| महावीर हनुमान और उनकी पूरी वानर सेना बड़े-बड़े पत्थरों पर “श्री राम” नाम लिखकर समुन्द्र में रख देते और सेतु  का निर्माण करने लगे | तभी भगवान् श्री राम की नज़र उस  गिलहरी पर पड़ी, जो पहले समुद्र किनारे पड़ी धुल पर लोट कर धुल अपने शरीर पर चिपका लेती और फिर पुल पर आकर झिटक देती| वह लगातार इस काम को करती जा रही थी| काफी देर तक उस गिलहरी को ऐसा करते देख भगवान्  राम उस गिलहरी के पास गए और गिलहरी को प्यार से अपने हाथों से उठा कर बोले- यह तुम क्या कर रही हो| गिलहरी ने भगवान् श्री राम को प्रणाम किया और बोली- महाबली वीर बजरंग बलि हनुमान और उनकी पूरी सेना बड़े-बड़े पत्थरों से इस पुल का निर्माण कर रही
हैं, लेकिन में छोटी सी गिलहरी यह सब नहीं कर सकती इसिलिए मुझसे जितना बन पड रहा है में वो कर रही हूँ|में भी इस काम मे अपना छोटा सा योगदान देना…

महाभारत के युद्ध में भोजन प्रबंधन |

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महाभारत को हम सही मायने में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध कह सकते हैं क्योंकि शायद ही कोई ऐसा राज्य था जिसने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।  आर्यावर्त के समस्त राजा या तो कौरव अथवा पांडव के पक्ष में खड़े दिख रहे थे। श्रीबलराम और रुक्मी ये दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।  कम से कम हम सभी तो यही जानते हैं। किन्तु एक और राज्य ऐसा था जो युद्ध क्षेत्र में होते हुए भी युद्ध से विरत था। वो था दक्षिण के "उडुपी" का राज्य। जब उडुपी के राजा अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुँचे तो कौरव और पांडव दोनों उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न करने लगे।  उडुपी के राजा अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा - "हे माधव ! दोनों ओर से जिसे भी देखो युद्ध के लिए लालायित दिखता है किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि दोनों ओर से उपस्थित इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध कैसे होगा ? इस पर श्रीकृष्ण ने कहा - महाराज ! आपने बिलकुल उचित सोचा है। आपके इस बात को छेड़ने पर मुझे प्रतीत होता है कि आपके पास इसकी कोई योजना है। अगर ऐसा है तो कृपया बताएं।  इसपर उडुपी नरेश ने कहा - "हे वासुदे…

जब भगवान राम ने भक्त के लिए बनाई रसोई |

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बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं। लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं

गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी
आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा ...

अब आनंद महाराज के आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो। महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।

उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो .... हम नहीं…

मृत्यु से भय कैसा ?

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राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ।
अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।
"राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा  पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी।
"जंगल में सिंह, भेड़िये आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।"
रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बंजारे की झोंपड़ी देखी । वह बंजारा ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयु…

आखिर क्यों महर्षि दुर्वासा ने इन्द्र को लक्ष्मीहीन होने का श्राप दिया

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एक बार भगवान शंकर के अंशभूत महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमत-घूमते वे एक मनोहर वन में गए। वहाँ एक विद्याधर नाम की स्त्री अपने हाथ में पारिजात पुष्पों की माला लिए खड़ी थी, वह माला दिव्य पुष्पों की बनी थी। उसकी दिव्य गंध से समस्त वन-प्रांत सुवासित हो रहा था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला माँगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।
इसी समय मुनि को देवराज इंद्र दिखाई दिए, जो मतवाले ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत-से देवता भी थे। मुनि ने अपने मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौरे गुंजार कर रहे थे। जब देवराज इंद्र समीप आए तो दुर्वासा ने पागलों की तरह वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज इंद्र ने उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूँड से माला उतार ली और सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और देवराज इंद्र से इस प्रकार बोले, ''अरे ओ इंद्र! ऐश्वर्य के घमंड से तेरा ह्रदय दूषित हो गय…

श्री राम के अलावा इन 5 से भी हार गया था रावण |

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बालि से रावण की हार एक बार रावण बालि से युद्ध करने के लिए पहुँच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकारने लगा, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न होने लगी।रावण के ऐसा बार-बार करने पर बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा पूर्ण की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से अपने आप को आजाद नहीं करा पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था।
सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो उसने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। उसने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और फिर पानी को छोड़ दिया, जिससे रावण और उसकी पूरी सेना नर्मदा के बहाव …

कृष्ण का नाम कृष्ण ही क्यों पड़ा।

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एक दिन वासुदेव प्रेरणा से कुल पुरोहित गर्गाचार्यजी गोकुल पधारे। नन्दबाबा और यशोदाजी ने गर्गाचार्यजी का बड़ा आदर-सत्कार किया और वासुदेव और देवकीजी की कंस कारागृह में स्थिति को जाना, और तत्पश्चात जब नन्दबाबा ने गर्गाचार्यजी से आने का कारण पूछा तो गर्गाचार्यजी ने बतलाया कि पास के गांव में एक बालक ने जन्म लिया है। मैं उस बालक के नामकरण के लिए जा रहा हूँ। इसी रास्ते में आपका घर भी पड़ता है सो मैं आपसे मिलने को आया हूँ। यह सुन कर नन्द-यशोदा ने अनुरोध किया कि बाबा हमारे यहाँ भी दो बालकों ने जन्म लिया है आप कृपया उनका भी नामकरण करने कि कृपा करे।
गर्गाचार्यजी ने इस कार्य को करने में असमर्थता जताई और कहा की आपको हर कार्य जोर शोर से करने की आदत है। अगर कंस को इस बात कि जानकारी हो गयी तो मेरा जीना मुहाल हो जाएगा। नन्द बाबा कहने लगे भगवन आप इस कार्य को गौशाला में निर्विघ्न रूप से आयोजित कर सकते है तथा इस कार्य की किसी को जानकारी भी नहीं हो पाएगी। गर्गाचार्यजी तैयार हो गये। जब रोहिणी ने सुना कि कुल-पुरोहित आए हैं वे उनका गुणगान बखान करने लगी। यशोदाजी ने कहा कि गर्गाचार्यजी इतने बड़े पुरोहित हैं तो …