" हरी नाम की महिमा " भाग 1



एक बार प्रभु श्रीराम जी ने दरबार लगाया था । आस पास के कई राजाओ और महाराजाओ को दरबार में आने का निमंत्रण भेजा गया । प्रभु ने सभी राजाओ और महाराजाओ को समझाया की कैसे राज्य चलाना चाहिए और कैसे प्रजा का पालन करना चाहिए । उस सभा में प्रभु श्रीराम ने कहा की प्रजा पुत्र सामान होती हैं । एक राजा को अपनी प्रजा को पुत्र समान समझना चाहिए । सभा में प्रभु श्रीराम ने कहा की जिस राजा को प्रजा प्यारी नहीं लगती वो राजा नर्क का उत्तराधिकारी होता हैं । इसी सभा के एक द्वार था जिस से सभी राजा और महाराजा अंदर जा रहे थे । उस द्वार पर नारदजी आकर बैठ गए, नारदजी ने एक राजा को सम्मान के साथ रोका और कहा की अंदर जाकर प्रभु श्री राम को शीश निवाना ( नमन करना ) तथा सभी ऋषियों और मुनियों को शीश निवाना और सम्मान देना परन्तु विश्वामित्र को ना तो शीश निवाना और ना ही सम्मान देना ।

नारद जी के ऐसा कहने पर राजन ने विश्वामित्र का सम्मान न करने का कारण पूछा तो नारद जी ने राजन से कहा की विश्वामित्र क्षत्रिय हैं और तुम भी क्षत्रिय हो तो क्षत्रिय का क्षत्रिय को नमन करना नहीं बनता हैं ।

ये तो आप सभी जानते हैं की एक बार जो नारद जी की बात मान ले तो वो कहा बच सकता हैं । राजा नारदजी की बातो में आ गया । राजा ने दरबार में जाकर सबको नमन किया परन्तु जानबुझ कर विश्वामित्र को नमन नहीं किया ।

राजा के द्वारा किया गया अपमान विश्वामित्र से सहा नहीं गया । विश्वामित्र ने क्रोध में भरकर प्रभु श्रीराम से कहा की राम तुम्हारे दरबार में मेरा अपमान हुआ हैं इस राजा ने मुझे नमन नहीं किया ।
मैं चाहता हूँ की कल सूरज छिपने से पहले तुम इस राजा को मृत्युदंड दो नहीं तो मैं तुम्हे श्राप देता हूँ ।

प्रभु श्रीराम ने कहा गुरुदेव अभी-अभी चौदह वर्ष का वनवास भोग कर आया हूँ । आप चिंता मत कीजिये मैं आपके चरण छूकर प्रतिज्ञा करता हूँ की कल सूरज छिपने से पहले इस राजा को मृत्युदंड अवश्य दूंगा ।

राजा की जान पर बन आयी वो भागा-भागा नारदजी के पास आया और नारदजी से कहने लगा की प्रभु मैंने आपका क्या बिगाड़ा जो आपने मेरी जान ही ले ली । नारद जी ने पूछा आखिर हुआ क्या । तो राजा ने सारा दृष्टांत कह सुनाया तब नारद जी ने राजा से कहा की तुम घबराओ मत और अब मैं जो कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो । हनुमानजी के घर जाओ, और माँ अञ्जनी को शीश नवा ( नमन करके ) के सारा दृष्टांत कह सुनाना । मुझे पूरा भरोसा हैं की हनुमानजी तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे । राजन ने देर ना करते हुए तुरन्त हनुमानजी के घर की तरफ प्रस्थान किया और माँ अञ्जनी से मिलकर सारी व्यथा कह सुनाई तथा अपने जीवन की रक्षा की गुहार लगाई ।

तत्पश्चात माँ अञ्जनी ने राजन से कहा की राजन तुम बाहर बैठो । अभी कुछ क्षणों में मेरा पुत्र हनुमान आएगा मैं उस से कह दूँगी, वो तुम्हारी रक्षा अवश्य करेगा । राजा बाहर जाकर एक पेड़ के निचे बैठ गया ।

रामजी की सेवा के बाद हनुमानजी घर को लौटे । माँ अञ्जनी के चरणों में शीश नवाया ( नमन किया ) और आशीर्वाद लिया । माँ अञ्जनी ने बड़े प्रेम से हनुमानजी को भोजन कराया और हनुमानजी से कहने लगी हनुमान मैं आज तुम से कुछ माँगना चाहती हूँ, दोगे ! हनुमानजी गद-गद होकर बोले वाह मैया आज का दिन मेरे लिए कितना अच्छा हैं, मैं रोज सोचता था की माँ मुझ से कुछ मांगे । हनुमानजी बोले मैया जो माँगोगी मैं दूंगा यदि प्राण भी मांग लो तो चरणों में रख दूंगा । माता ने कहा की एक राजा ने हमारी शरण ली हैं । किसी राजा ने उसे कल तक मारने की प्रतिज्ञा की हैं, और कहा सुनो हनुमान उस राजा के जीवन की रक्षा का मैंने वचन दिया हैं । हुनमान अब तुम्हे मेरे वचन का दायित्व निभाना होगा तथा उस राजा के जीवन की रक्षा करनी होगी ।

माँ की बात सुन कर हनुमानजी खूब हँसे और बोले मैया बस इतनी सी बात । मैया मैं तुम्हारे चरणों की सौगंध खा कर कहता हूँ कि उस राजा का बाल भी बांका नहीं होगा । " जरा देखिये विधि कि कैसी विडम्बना हैं उधर रामजी ने प्रतिज्ञा ली हैं कि सूरज छिपने से पहले राजा के जीवन कि लीला समाप्त करूंगा और इधर हनुमानजी ने अपनी माँ के चरणों को छूकर प्रतिज्ञा ली हैं कि राजा का बाल भी बांका नहीं होने दूंगा "

आईये देखते हैं आगे क्या होता हैं । हनुमानजी ने माँ से पूछा कि मैया वो राजा हैं कहा । माँ अञ्जनी ने कहा बाहर मंदिर के पिछवाड़े बैठा हैं ।

हनुमानजी राजा के पास पहुंचे । हनुमानजी को अपनी और आता देख राजा सहमा सहमा सा हनुमानजी के चरणों में गिर पड़ा । राजा कहने लगा " अञ्जनी लाल मैं शरण तुम्हारी मेरी रक्षा कीजे, संकट मोचन नाम तिहारा अभयदान मोहे दीजे "

हनुमानजी ने राजा को उठाया और कहा कि राजा सभी चिंता त्याग दो अगर काल स्वयं भी आ गया तो भी मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा । फिर हनुमान जी ने राजा से कहा कि जिसने तुम्हारी प्राण लेने कि प्रतिज्ञा कि हैं हमें उसका नाम तो बताओ । राजा ने कहा नहीं महाराज वो तो मैं नहीं बताऊंगा तब हनुमानजी बोले कि अगर तुम मुझे प्रतिज्ञा करने वाले का नाम नहीं बताओगे तो मैं तुम्हारी रक्षा किस प्रकार करूंगा । राजा ने कहा महाराज प्रतिज्ञा करने वाले का नाम सुन कर आप कही अपनी प्रतिज्ञा न भूल जाए, मुझे ऐसा डर हैं ।

राजा कि बात पर हनुमानजी खिलखिला कर हंस पड़े और बोले राजन मैं उस राम का सेवक हूँ जो कहते हैं कि 
" रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन ना जाई "

तब राजा ने कहा महाराज ऐसी बात हैं तो फिर सुनिए " राम जी ने ही वचन दिया हैं प्राण मेरे लेने का, उन्होंने ही संकल्प लिया हैं मृत्युदंड देने का "

ये बात सुनकर हनुमानजी थर-थर काँपने लगे और बोले अरे राजन तूने ये क्या किया । मैं उन चरणों का सेवक हूँ, उनसे तुझे कैसे बचाऊ । हनुमानजी बोले राजा तूने किस संकट में डाल दिया मुझे । तो राजा ने कहा प्रभु आपने माँ अञ्जनी के चरण छूकर प्रण लिया हैं कि आप मेरी रक्षा करेंगे ।

हनुमानजी ने उत्तर दिया यही चिंता तो खाये जा रही हैं कि मैंने माँ के चरण छुए हैं और रामजी कि सौगंध खाई हैं । अब ये प्रतिज्ञा कैसे पूरी होगी । तत्पश्चात हनुमानजी ने कहा अच्छा राजा अब तुम सरयू के तट पर जाओ और रातभर राम नाम का सुमिरन करो । मैं समय से पहले आ जाऊँगा । राजा बोला देखना महाराज कही मेरे प्राण पखेरू ना उड़ जाए, देरी ना कीजियेगा ।

हनुमानजी बोले " चिंता त्यागो चिंतन करो, चिंता चिंतन से जायेगी " 

हनुमानजी सारी रात सोये नहीं चिंतन में लग गए । " जरा सोचिये हनुमानजी के जीवन का इस से बड़ा संकट और क्या होगा कि एक तरफ श्रीराम कि पावन भक्ति हैं और दूसरी तरफ राजा के प्राण रक्षा के लिए माता अञ्जनी को दिया हुआ वचन "।

हनुमानजी उठ बैठे और कीर्तन करने लगे-

प्रभुजी आया कष्ट अपार, रामजी आया कष्ट अपार सिर पर हाथ धरो ।
मेरी नौका फॅंसी मजधार भगवन पार करो, रामजी पार करो ॥

तेरा द्वारा छोड़ प्रभु जी किसके द्वारे जाऊ, तुम बिन मेरा कौन प्रभुजी किस को व्यथा सुनाऊ ।
मोहे सूझे ना कोई द्वार सिर पर हाथ धरो, मेरी नौका फॅंसी मजधार भगवन पार करो, रामजी पार करो ॥

संकट मोचन कहे जगत मोहे मैं संकट में आया, तुम संग कैसे युद्ध करूँ मैं ये क्या खेल रचाया 
तेरी लीला अपरम्पार सिर पर हाथ धरो, मेरी नौका फॅंसी मजधार भगवन पार करो, रामजी पार करो ॥

भक्त और भगवान् में अंतर अन्तर्यामी क्या हैं मेरी, आपकी प्रतिज्ञा में मानो युद्ध छिड़ा हैं ।
होगी दोनों कि ही हार सिर पर हाथ धरो, मेरी नौका फॅंसी मजधार भगवन पार करो, रामजी पार करो ॥

नित्य प्रति कि भाति प्रातः भारी मन के साथ हनुमान जी राम जी के पास पहुंचे । चरण सेवा करते करते हनुमानजी ने राम जी से कहा कि प्रभुजी जी चाहता हैं कि आज आप से कुछ माँगू । ये सुनते ही रामजी खड़े हो गए और बोले मांगो हनुमान मांगो, मैं जीवनभर यही सोचता रहा हूँ कि मेरा हनुमान मुझसे कुछ नहीं मांगता ! मांगो मैं दूंगा जल्दी मांगो

हनुमानजी ने सोचा यदि मैंने राजा के प्राण मांग लिए तो प्रभु उस राजा को जीवनदान दे देंगे ये मुझे पूर्ण विश्वास हैं ये अपनी प्रतिज्ञा तोड़ डालेंगे । वो तो पहले ही कहते हैं " अपना परम विस्तार भगत का पूरा परम निभाऊं " नहीं-नहीं मैं रामजी से नहीं मांगूंगा । उनकी प्रतिज्ञा नहीं टूटने दूंगा

रामजी ने कहा मांगो हनुमान चुप क्यों हो गए मांगो ना, मांगो किस सोच में पड़ गए हो । हनुमानजी ने कहा आज के दिन कि छुट्टी दे दीजिये भगवन । राम जी ने कहा बस इतनी सी बात हनुमान जी बोले भगवन कभी आपके चरणों से दूर नहीं हुआ हूँ ना इसलिए संकोच में पड़ गया था ।

रामजी ने कहा जाओ मुझे भी आज एक राजा को मुक्ति देनी हैं । हनुमानजी ने मन में विचार किया कि " मुझे भी तो उसी राजा कि रक्षा करनी हैं "।

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