" हरी नाम की महिमा " भाग 2



अब आगे--
फिर हनुमानजी ने रामजी से आज्ञा ली और सरयू के तट की और प्रस्थान किया । हनुमानजी को अपनी और आता देख राजा की जान में जान आयी । राजा ने हनुमानजी से कहा की प्रभु आपने रामजी को मना लिया । आपकी कृपा से मुझे जीवनदान मिला है मैं आपका बहुत बहुत आभारी हूँ । हनुमानजी बोले राजन तुमने मुझे बहुत बड़े संकट में डाल दिया हैं । अभी-अभी राम जी घोड़े पर सवार होकर इसी और आ रहे है, और साथ में रामबाण भी ला रहे हैं । वो तुम्हे मृत्युदंड देंगे पर तुम चिंता मत करो, मैं भी रामबाण साथ लाया हूँ । प्रभु से मैं भी रामबाण से ही युद्ध करूंगा । 

तब राजा बोला की प्रभु तो मैं बैठ जाऊ । हनुमानजी बोले नहीं रे पगले मैं उनके सामने इस शरीर को लेकर कैसे आ सकता हूँ । ये लो खरताल मैं तुम्हारी पीठ के पीछे छोटा सा रूप धारण करके छूप जाऊँगा । जब प्रभु श्रीराम आये तो तुम यह बाण चलाना । फिर हनुमानजी ने राजा के कान में मंत्र फूक दिया । जब भगवान आये तो, राजा नाच नाच कर गाने लगा

रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम ।
सीताराम जय सीताराम, सीताराम जय, सीताराम ॥

महावीर के मंत्र को राजा ने नाच नाच कर गाना शुरू कर दिया । प्रभु श्रीराम ये देखकर अचरज में पड़ गये कि ये तो मेरा परम भगत है मैं इसे कैसे मार सकता हूँ । रामजी ने धनुष-बाण नीचे कर लिया और अपने महल की ओर लौट आये । गुरु विश्वामित्र ने पूछा क्यूँ राम दंड  दे आये राजा को । रामजी बोले प्रभु वो तो भगवन नाम सुमिरन कर रहा हैं । उसे कैसे मारूंगा गुरुदेव । यह सुनकर विश्वामित्र जी बोले अच्छी बात है मैं तुम्हे श्राप देता हूँ ।

रामजी ने विश्वामित्र जी के चरण पकड़ लिए ओर बोले नहीं राजऋषि नहीं अभी सूरज छिपने में बहुत समय पड़ा है मैं अभी शक्ति बाण लेकर जाता हूँ और उस राजा को मृत्युदंड देकर ही लौटूंगा । यह सब हनुमानजी ने अपनी विद्या से जान लिया और राजा से कहा कि वो देखो प्रभु श्रीराम आ रहे है, तू ये शक्ति बाण ले और अब नाच और गा । राजा नाचने और गाने लगा-

जय जय सियाराम, जय जय सियाराम, जय जय सियाराम, जय जय सियाराम ।
जय जय सियाराम, जय जय सियाराम, जय जय सियाराम, जय जय सियाराम ॥

यह सुनकर रामजी फिर परेशानी में पड़ गये अरे ये तो सीता का भक्त बन गया । इस पर शक्ति बाण कैसे चलाऊ । इसे मारना उचित नहीं है रामजी महलो की और वापस लौटे । विश्वामित्र आग बबूला हो गये, रामजी से धनुष छीन लिया और बोले तुम भूल गये हो राम मैंने ही तुम्हे धनुष चलाना सिखाया हैं । अब मैं ही उस राजा को यमलोक पहुँचाऊँगा । यह सुन रामजी गुरु विश्वामित्र के चरणों में गिर पड़े और बोले नहीं गुरुदेव नहीं ! इस बार वो मेरे हाथ से नहीं बचेगा । मैं प्रलय बाण लेकर जाऊँगा । उधर हनुमानजी ने राजा को सूचना दी अरे राजा तेरे कारण प्रभु प्रलय बाण लेकर आ रहे हैं । परन्तु तू चिंता मत कर इस बार मैं स्वयं उनके सामने आता हूँ । तू नाच नाच का गा-

जय जय सियाराम, जय जय सियाराम, जय जय सियाराम, जय जय हनुमान ।
जय जय हनुमान, जय जय हनुमान, जय जय हनुमान, जय जय हनुमान ॥

यह देखकर रामजी को पसीना आ गया अरे ये तो मेरे परम भक्त हनुमानजी का भक्त बन गया । इसे मार दिया तो हनुमानजी क्या कहेंगे, प्रभु मेरा एक ही तो भक्त बना था आपने उसे भी मार दिया । प्रभु श्रीराम ने सोचा इसे नहीं मारूंगा पर जब विश्वामित्र का ध्यान आया तो धनुष उठा लिया । प्रभु श्रीराम दुविधा में फसे हुए हैं ।

वैसे विचार करने की बात हैं की अयोध्या पति इधर से उधर दौड़ रहे हैं तो क्या अयोध्या के मंत्रीगण, ऋषिमुनि चुप-चाप बैठे होंगे ! नहीं वशिष्ठ जी ने सभा बुलाई । वहाँ नारद जी ने आकर कहा आप सभी विश्वामित्र को समझाओं की राजऋषि आपके प्रभु श्रीराम इस समय संकट में हैं । सुबह से राम और राम नाम में युद्ध चल रहा हैं । राम के सामने "नाम" खड़ा हो गया हैं । उन्हें कहिये की रामजी में वो बल नहीं हैं जो अपने नाम को जीत सके । रामजी में वो शक्ति नहीं हैं की अपने नाम के आगे डट सके । और उन्हें कहिये की आपके परम शिष्य की हार होने वाली हैं कृपा करके उनकी रक्षा करे । अपना वचन वापस लेकर रामजी को बचा ले । विश्वामित्र जी मान गये, सभी मंत्रीगण, ऋषि, महात्मा सरयू के तट पर आये । विश्वामित्र ने दूर से ही आवाज लगायी । राम ठहर जाओ, उतार दो बाण धनुष से ! उतार दो । मैंने राजा को क्षमा कर दिया हैं आप भी क्षमा कर दीजिये । रामजी ने घोड़े से उतर कर विश्वामित्र को प्रणाम किया ।  तभी हनुमानजी भी अपने मूल स्वरुप में आ गये और राम नाम का जयकारा लगाकर प्रभु श्रीराम के चरणों में शीश नवा दिया ( नमन किया )।  यह देख वहाँ खड़े सभी लोग प्रभु श्रीराम और हनुमानजी के जयकारे लगाने लगे-

जय जय अवधबिहारी राम, जय जय हनुमान बजरंगी ।
जय जय अवधबिहारी राम, जय जय हनुमान बजरंगी ॥

तभी नारदजी सामने आये ओर उन्होंने कहा प्रभु अभी तो त्रेतायुग चल रहा हैं । सबको आपका दर्शन हो रहा है पर एक समय आएगा जब कलयुग में कोई भाग्यशाली आपके दर्शन कर पायेगा । मैंने हनुमानजी के द्वारा आपसे बलशाली आपके नाम की महिमा दर्शायी हैं । क्षमा करना प्रभु अगर मैं ये कह दूँ की

"राम से बड़ा राम का नाम"
संत महात्माओ ने कहा हैं-

"हरी अनंत हरी कथा अनंता"

अर्थार्त- जिस प्रकार हरी की महिमा अनंत हैं उसी प्रकार हरी के भक्तो की भी अनगिनत कथाये हैं जो सत्मार्ग को दिखाने वाली हैं ।

आप सभी भी हरी कथाओ को सुने ओर सुमिरन करके औरो को सुनाये इससे आपको और सुनने वालो को, दोनों को ही अद्भभुत शांति का अहसास होगा ।

॥ सियापति रामचंद्र की जय ॥

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