जो जैसा बोता है, वो वैसा काटता है... ( भाग २ )




वही दूसरी और कृष्ण और गोपियों के बीच बहुत प्यार था, गोपियाँ सोचती कृष्ण आयेंगे तो उनके लिए कुछ उपहार लायेंगे ! कृष्ण कुछ नहीं लाये और उल्टा उनका ही माखन और दही उनसे ले लिया ! कर्ण जब घायल थे, तब कृष्ण आपने मित्र अर्जुन को ले के उनके मैदान में चले गए और कहा- हे कर्ण ! हमने सुना है की कोई भी तुम्हारे दरवाजे से कभी खाली हाथ  नही जाता, हम तुमसे मांगने आये थे, पर लगता है तुम कुछ देने की हालत में नहीं हो ! कर्ण ने कहा- वासुदेव रुकिए, खाली हाथ मत जाइये, मेरे दांत सोने के है और वही रखा एक पत्थर  उठा लिया और आपने दो दांत तोड़ कर, एक अर्जुन को दे दिया और एक कृष्ण के हाथ में रख दिया ! सुदामा भी आपने मित्र कृष्ण के पास कुछ मांगने गए थे, ताकि उनका गुजरा हो सके, पर कृष्णा ने उनसे उनके बगल में दबी चावल की पोटली मांग ली और उस चावल को खुद ने भी खाया और आपनी रानियों को भी खिलाया ! जो कुछ भी सुदामा के पास था सब खाली कर दिया !

बाद में सुदामा को भी बहुत कुछ दिया, कर्ण को भी दिया,गोपीयों को भी दिया, बलि को भी दिया, हनुमान, सुग्रीव, केवट सभी को कुछ न कुछ दिया, पर सबसे पहले उन्होंने सबसे लिया ही था !

भगवान जब कभी आते है तो मांगते हुए ही आते है ! कभी भगवान् से आपका साक्षात्कार होगा तो ये मान कर चलना की वह आपसे मांगते हुए आयेंगे !  जैसे भगवान् संत नामदेव के पास कुत्ते के रूप में आये और रोटी लेकर भागे थे, तब नामदेव भी अपना दिल बड़ा करके उनके पीछे यह कहते हुए भागे थे- रुकिए घी तो लगा लीजिये रोटी सुखी मत खाइये ! आप भी अपना दिल हमेशा खोल के रखा करिये क्या पता कब भगवान् आपसे कुछ मांगने आ जाये !

युगऋषि कहते है, अगर अच्छी जगह बोया तब लाभ ही लाभ है, लेकिन कही ख़राब जगह पर, पत्थर पे बो दिया तो मुश्किल है ! युगऋषि कहते है देने में जीवन का सबसे बड़ा सुख है, उन्होंने भी अपनी चारो चीजे भगवान् के खेत में बो के ही सारी ऋद्धियाँ और सिद्धिया प्राप्त की है 

अब आप भी ये तो जान ही गए है, की देना कितना सुखदायक होता है ! एक बात हमेशा ध्यान रखिये की सही समय पर और सर्वसमर्थ को देना चाहिए ! भगवान् के खेत में ही बोने से बोई हुई चीज़ सौ गुना होकर मिलेंगी, गलत जगह बोने से न केवल जीवन का बल्कि धन का भी नाश हो सकता है !

                                                                                          वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्री राम शर्मा आचार्य की किताबो से प्रेरित

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