कुसङ्ग से हानि एवं सुसङ्ग से लाभ


प्रियादासजी नाभाजी के हार्दिक भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि- अहो ! यदि मुझे बार-बार  जन्म लेकर संसार में आना पड़े तो इसकी मुझे कुछ भी चिंता नहीं हैं क्योंकि इसमें बड़ा भारी यह लाभ होगा कि सन्तों के चरण कमलों कि रज सिर पर धारण करने का सुबह अवसर मिलेगा । प्राचीनबर्हि आदि भक्तों की कथाएँ पुराण-इतिहासों में वर्णित हैं । परन्तु महर्षि वाल्मीकि की कथा को कभी चित्त से दूर नहीं करना चाहिये । महर्षि वाल्मीकि पहले भीलों का साथ पाकर भीलों का सा आचरण करने वाले हो गये फिर सन्तों का संग पाकर ऋषि हो गये । उन्हें श्रीरघुनाथजी के दर्शन हुए । उन्होंने अपनी वाल्मीकि रामायण में श्रीरामजी के चरित्रों का विस्तार पूर्वक ऐसा उत्तम वर्णन किया है, जिन्हे गाते और सुनते हुए संसार तृप्त नहीं होता है । श्रोताओं और वक्ताओं  के हृदय उत्त्कट प्रेमानुरागमय भावों से भर जाते हैं फिर आनन्दवश नेत्रों से आँसुओ की धारा बहती रहती है ।

बँगला-भाषा के कृत्तिवास रामायण के अनुसार ये अंगिरागोत्र में उत्पन्न एक ब्राह्मण थे । नाम था रत्नाकर । बालपने से ही किरातों के कुसंग में पड़कर ये किरात ही हो गये थे । ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया था । सदा शूद्रों सा आचरण करने लगे थे । शूद्रा स्त्री से इनके बहुत सी संतान हुईं । सहज रीती से परिवार का पालन-पोषण न होते देख इन्होने लूटमार का रास्ता अपनाया । नित्य ही धनुष-बाण  लिए वन में जीवों का घात करते रहते थे । जो भी यात्री वन पथ से निकलता, उसे बिना कुछ सोचे समझे मार डालते थे और उसके पास जो कुछ भी मिलता उससे परिवार का पालन करते । वह मार्ग यात्रियों के लिए मौत की घाटी बन गया था । वर्णन आया है कि इन्होने इतनी हत्यायें की थीं कि उनमे जो द्विजाति थे उनके केवल यज्ञोपवीत साढ़े सात बैल गाडी एकत्र हो गये थे । जीवों का यह महान संकट सप्तऋषियों से देखा नहीं  गया । वे प्राणिमात्र को इस घोर विपत्ति से बचाने के लिये तथा इनके ऊपर भी अनुग्रह करने के लिये उसी रास्ते से निकले, जिस घोर वन में इनका अड्डा था । (कही कही देवर्षि नारदजी का आना वर्णन किया गया है । कल्पभेद से सब ठीक है ।)

श्रीकश्यप, अत्रि, भारद्वाज, वशिष्ठ, गौतम, विश्वामित्र और जमदग्नि - इन परम तेजस्वी सप्तर्षि मंडल को आते हुए देखकर ये 'खड़े रहो, खड़े रहो' ऐसा कहते हुए दौड़ पड़े भाग तो लेंगे ही यीशु ने कहा भोले ब्राह्मण एक बार तो हम लोगों के परन्तु उन परम समर्थ ऋषियों को इनसे न तो भय हुआ, न इन पर किंचित क्रोध ही । बल्कि सहज स्वभाव से कोमल चित उन सन्तों को इस माया-मोहित जीव पर दया आई और इन्हें देखकर पूछे द्विजाधाम ! तू क्यों दौड़ रहा है ? क्या चाहता है ? हम लोगों ने तो तुम्हारा कुछ बिगाड़ा भी नहीं है फिर हम निरपराधों पर शस्त्राघात से तुम्हारा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? इन्होने कहा कि मेरे पुत्र, स्त्री आदी बहुत हैं, वे भूखे हैं । इसलिये आप लोगों के वस्त्रादिक लेने आ रहा हूँ । ऋषिगण विकल  नहीं हुये किन्तु प्रसन्न मन से बोले कि तू घर जाकर पहले ये तो पूछ आ कि जो पाप तूने बटोरा  है इसको वे लोग भी बँटावेंगे कि नहीं ? इन्होने सहज उत्तर दिया- यह कैसे हो सकता है कि जो मेरे पाप से कमाये धन से सुख भोगते हैं तो वे मेरे पाप के फल में भी भाग लेंगे अर्थात भाग तो लेंगे ही । ऋषियों ने कहा- भोले ब्राह्मण ! एकबार तू हम लोगों के कहने से पूछ तो ले और यदि तुम्हे यह सन्देह हो कि हम लोग भाग जायेंगे तो हम लोगों को वृक्षों से कसकर बाँध दो । इन्होने ऐसा ही किया । घर जा कर पिता-माता-स्त्री-पुत्र आदि सबसे एक-एक कर पूछा, परन्तु हर एक ने यही उत्तर दिया कि हम तुम्हारे पाप के भागी नहीं, वह पाप तो सब तुझको ही लगेगा । हम लोग तो केवल फल को ही भोगने वाले हैं । कुटुम्बियों के ऐसे कोरे जवाब को सुनकर इनके मन में बड़ा खेद और ग्लानि हूई कि जिनके लिये मैंने इतना पाप किया । वे केवल स्वार्थ के साथी निकले ।

फिर तो इनके मन में संसार से वैराग्य हो गया और दौड़े-दौड़े मुनियों के पास आये । अन्तः करण के सच्चे पश्चाताप एवं ऋषियों के परम-पावन दर्शन से इनका हृदय शुद्ध हो गया । ये क्रन्दन करते हुये दण्डाकार उन ऋषियों के पैरों पर गिर पड़े और अत्यंत दिन वचन बोले - 'हे मुनि श्रेष्ठ ! नरक रूप समुद्र में आन पड़ा हूँ । मेरी रक्षा कीजिये' मुनि बोले - उठ, उठ, तेरा कल्याण हो, सज्जनों का मिलना तुझको सफल हुआ, जो कि तुझे आत्मोद्धार कि चिन्ता हूई । हम तुम्हे उपदेश देंगे जिससे तूँ मोक्ष पावेगा मुनि परस्पर विचार करने लगे कि यह अधम है तो क्या, अब शरण में आ गया है अतः रक्षा करना उचित है और फिर इनको 'राम' नाम का सीधा उच्चारण करने में असमर्थ देखकर 'मरा' 'मरा' जपने का उपदेश दिया अब शरण में आ गया है अतः रक्षा करना उचित है और फिर इनको राम नाम का सीधा उच्चारण करने में असमर्थ देख-देखकर मरा मरा जपने का उपदेश दिया । श्रीतुलसीदासजी ने भी लिखा है - राम विहाइ मरा जपते बिगरी सुधरी कवि कोकिल हो की ॥ पुनः 'उलटा नाम जपत जग जाना । वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ॥' और कहा कि एकाग्र मन से इसी ठौर स्थित रहकर मन्त्र को जपो, जब तक हम फिर लौट ना आवें ।
इन्होंने ऐसा ही किया, नाम में तदाकार हो गये देह सुधि भूल गई, दीमकों ने देह पर मिट्टी का ढेर लगा दिया । जिससे वह बांबी हो गई, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष की तो बात क्या, इस प्रकार नामानुरागनिमग्न इनको एक हजार युग बीत गये । ऋषि फिर आए और बोले कि बांबी से निकल ये मुनियों के वचन सुनते ही निकल आये । उस समय मुनि बोले - कि अब तू  'मुनि वाल्मीकि' नामक मुनीश्वर है, क्योंकि तेरा यह जन्म वाल्मीकि से हुआ है । तभी तो श्रीप्रियादास जी कहते हैं कि भये वाल्मीकि ऋषि भये।

श्री वाल्मीकि जी का यह प्रसङ्ग कुसङ्ग से हानि एवं सुसङ्ग से लाभ का ज्वलन्त उदाहरण है । श्री रामचरितमानस में श्रीतुलसीदासजी ने कुसङ्ग और सुसङ्ग का बड़ा ही हृदयग्राही  वर्णन किया है ।

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