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Showing posts from September, 2018

ऐसा बालक जिसे जीवन रहते हुए यमराज से ज्ञान प्राप्त किया।

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नचिकेता के पिता जब विश्वजीत यज्ञ के बाद जीवन-भर पाली गयी गायों को ब्राह्मणों को दान में देने लगे तो नचिकेता ने अपने पिता से पूछा कि आप मुझे दान में किसे देंगे? उस समय नचिकेता के पिता यज्ञोपरान्त ब्राह्मणो और संतो की सेवा में लगे हुए थे। नचिकेता के द्वारा यह  प्रश्न पिता से बार बार किया गया जिससे नचिकेता के पिता क्रोध से भरकर बोले कि मैं तुम्हें मृत्यु को दान में देता हूँ। नचिकेता ने पिता के वाक्य को सत्य करने के लिए मृत्यु को अपना स्वामी स्वीकार किया और मृत्यु के घर शमशान की ओर प्रस्थान किया। शमशान पहुँच कर मृत्यु को ढूंढने लगे तभी कही से यमदूत ने नचिकेता के समक्ष आकर पूछा की बालक तुम क्या ढूंढ रहे हो। यमदूत के पूछने पर नचिकेता ने कहा की मुझे मृत्यु से मिलना है, मेरे पिताजी ने मुझे मृत्यु को दान में दिया है। ऐसा कहकर नचिकेता ने यमदूत से पूछा की आप कौन है। बालक के पूछे जाने पर यमदूत ने कहा मैं यमराज का दूत हूँ। यमराज मेरे राजा है, तब नचिकेता ने यमदूत से कहा की आप यमराज से कहिये की मैं उन से मिलने आया हूँ। बालक के बात सुनकर यमदूत ने कहा की यमराज अभी अपने महल में नहीं है। वे किसी आवश्य…

कलयुग का अंत आते आते कैसी हरकते करने लगेंगे लोग ?

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कलयुग का प्रभाव

सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और उसके बाद आया कलयुग। वैसे तो हमारे ग्रंथो में कलयुग के प्रभाव के बारे में साफ़ साफ़ जानकारी दी गयी है। परन्तु क्या आपने कभी सोचा है की जो प्रभाव कलयुग के हमारे ग्रंथो में बताये गये है उनका वास्तविक स्वरुप कैसा है। आज हम इसी बारे में कुछ अविस्मरणीय जानकारी आपके लिए लेकर आये है।

हमारे वेदो के अनुसार कलयुग अज्ञानता, अनैतिकता का युग है। पुराणों के अनुसार कलयुग का प्रारम्भ तीन हजार एक सो दो ईसा. पूर्व हो गया था। जब पांच ग्रह "मंगल, बुध, शुक्र, बृहस्पति और शनि" मेश राशि पर शून्य डिग्री पर आ गए थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण का युग "त्रेतायुग" का समापन हो गया था। ब्रंव्यवर्त पुराण के अनुसार कलयुग को सबसे अत्याचारी युग माना गया है। सृष्टि के आरम्भ में सतयुग से शुरुआत हुई तथा कलयुग के अन्त पर सृष्टि का अंत होगा। सभी युग एक चक्र में चलते रहते है सतयुग से लेकर कलयुग तक, कलयुग में मनुष्य जाति में आध्यमिकता का आभाव हो जायेगा और नैतिकता का अंत हो जायेगा। कलयुग में मनुष्य पर लालच, दुराचार, तृष्णा, क्रोध, वासना, जैसे आवेश हावी हो जायेंगे। य…

आखिर किसने पिया पूरे "समुद्र" को ?

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क्या आप जानते है हमारे सनातन धर्म में ऎसे-ऎसे ऋषि-मुनि हुए जिन्होंने अपने तप से अनेको अद्धभूत सिद्धियां प्राप्त की जिससे उन्होंने असम्भव कार्य को भी सम्भव बना दिया। ऎसे ही एक ऋषि हुए "ऋषि अगस्त्य" इन्होने अपनी शक्तियों से समुद्र का सम्पूर्ण जल पीकर उसे सूखा दिया था। "ऋषि अगस्त्य" अद्धभूत सिद्धियों के स्वामी थे उन्होंने देवताओ की सहयता के लिए अनेको अद्धभूत कार्य किये थे। एक बार उन्होंने समग्र समुद्र का जल पीकर उसे जल-विहीन कर दिया था।

आईये जानते है कि आखिर "अगस्त्य" मुनि ने ऐसा अद्धभूत कार्ये क्यों और किसके कहने पर किया-

सतयुग में एक दैत्य हुआ जिसका नाम "दैत्यराज वरतासुर" था। देवताओं से हुए एक भीषण युद्ध में वरतासुर मारा गया। उसके मरने के बाद दैत्यों के पास उनका कोई राजा नहीं था तब सारे दैत्य देवताओं के भय से समुद्र में छिप गए थे। समुद्र में छिपे सभी दैत्य हर समय यही विचार किया करते थे की किस प्रकार "देवराज इंद्र" का वध किया जाये। तब दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने दैत्यों को समझाया की देवताओं को अपनी सभी शक्तियाँ तप से ही मिलती है। इसल…

क्यों नारियल को पूजा जाता है ?

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नारियल की महत्वता !
सनातन धर्म में वैसे तो सभी फल किसी न किसी देवी-देवता को अर्पित किये जाते है। परन्तु सभी फलो में सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है नारियल को, आईये आज जानते है कि क्या कारण है जिस वजह से नारियल का महत्व इतना बढ़ा और लोग इसे श्रीफल भी कहने लगे तथा ऐसा क्यों है कि बिना नारियल कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं माना जाता है।

इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जिसके अनुसार नारियल का इस धरती पर अवतार ऋषि विश्वामित्र द्वारा हुआ। आईये आज आपको नारियल के जन्म की कथा से अवगत कराते है।

प्राचीन काल में एक राजा हुए, जिनका नाम था राजा सत्यव्रत ! राजा सत्यव्रत बड़े ही बहादुर और प्रतापी राजा थे । उनके मुख का तेज इतना था की उनकी एक दहाड़ से दुश्मन कापते थे । राजा स्वभाव से बड़े ही शांत और ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास रखते थे। वे आदि शक्ति के उच्कोटि के भक्त थे, चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाये, पर वे सुबह-शाम देवी की आराधना और उपासना करने से नहीं चूकते थे।  देवी भी अपने भक्त से बहुत प्रसन्न थी और देवी की विशेष कृपा से राजा सत्यव्रत को कोई कमी नहीं थी। भरा-पूरा परिवार, बहादुर सेना और सुशासित राज्य,…

दूर्वा और गणेश का अद्धभुत किस्सा

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एक बार, यमपुरी में एक त्यौहार के दौरान बहुत सी अप्सराएं एवं नृत्यकाएं नृत्य कर रही थी, उनमे से एक अति-सुन्दर अप्सरा थी, जिसका नाम दुरूतमा था। जिसे देखकर यम मोहित हो गये। जिस कारण यम से एनलासुर (अग्नि राक्षस) उत्पन्न हुआ। वह आकाश के सामान विशालकाय था। उसने संसार में आतंक मचा दिया था। अपने मार्ग में आने वाली हर वस्तु को अपनी अग्नशक्ति से भस्म कर रहा था। उसे स्वर्ग की ओर बढ़ता देख सारे देवगण घबरा गये और भगवान विष्णु के पास गये। भगवान् विष्णु के साथ मिलकर सभी देवगण श्रीगणेशजी से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे और उनसे मदद माँगी। श्रीगणेशजी ने एक छोटे से बालक का रूप लिया और एनलासुर से युद्ध करने पहुँच गये। यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा सभी देवताओं ने भी गणेशजी का साथ दिया। अन्त में जब गणेशजी को युद्ध का अन्त होता नजर नहीं आया तो उन्होंने एनालसुर राक्षश को निगल लिया। हालांकि, इस कारण उनके पेट में अतिशय गर्मी ने जन्म ले लिया जिससे गणेशजी को बहुत पीड़ा सहनी पड़ी। भगवान इंद्र ने श्री गणेश को अपने माथे पर पहनने का चंद्रमा दिया ताकि उन्हें उस असहनीय पीड़ा से कुछ शांति मिल सके। यह उपयोग कारगर साबित नहीं ह…

सच्चे भक्त कौन - भगवान् या भक्त ?

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सनातन धर्म में अनगिनत भक्त हुए जिन्होंने जीव को सिखाया की कैसे भगवत प्राप्ति की जा सकती है । ऐसी ही एक भक्तन हुई सखू बाई । महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के तट पर करवीर नामक तीर्थ स्थान है। अनेक वर्ष पूर्व वहां सखू बाई जी अपने पति और सासु माँ के साथ रहा करती थी । उनके पति का नाम दिगम्बर था, उनकी सासु माँ बहुत ही कठोर स्वाभाव की थी। वह सखू बाई को अत्यधिक प्रताड़ना दिया करती थी । उन्हें भूखा रखती थी, मारती-पीटती भी थी, सुबह से रात्रि तक वह सखू बाईं को किसी न किसी काम में उलझाए रखती थी। सारा दिन  काम करवाकर भी नित्य उन्हें डांट पड़ती ही रहती थी। सखू बाईं सब कुछ चुपचाप सहती थी। भोली-भाली सखू बाईं काम करते समय सदैव श्रीविठ्ठल के ( श्रीविठ्ठल अर्थात श्रीविष्णू का एक रूप, इनका महाराष्ट्र में पूजन किया जाता है ) स्मरण में लीन रहती थी। उनके मुख में सदैव पांडुरंग का (अर्थात श्रीविठ्ठल का) ही नाम रहता था।

एक बार आषाढी एकादशी के दिन पंढरपुर जाने वाली कीर्तन मंडली उनके गांव में पहुंची। कृष्णा नदी के तट पर कीर्तन मंडली ठहरी। वहां वारकरियों का अर्थात विठ्ठल भक्तों का भजन प्रारम्भ हुआ। एक महाराज कीर्तन कर…