सच्चे भक्त कौन - भगवान् या भक्त ?



सनातन धर्म में अनगिनत भक्त हुए जिन्होंने जीव को सिखाया की कैसे भगवत प्राप्ति की जा सकती है । ऐसी ही एक भक्तन हुई सखू बाई । महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के तट पर करवीर नामक तीर्थ स्थान है। अनेक वर्ष पूर्व वहां सखू बाई जी अपने पति और सासु माँ के साथ रहा करती थी । उनके पति का नाम दिगम्बर था, उनकी सासु माँ बहुत ही कठोर स्वाभाव की थी। वह सखू बाई को अत्यधिक प्रताड़ना दिया करती थी । उन्हें भूखा रखती थी, मारती-पीटती भी थी, सुबह से रात्रि तक वह सखू बाईं को किसी न किसी काम में उलझाए रखती थी। सारा दिन  काम करवाकर भी नित्य उन्हें डांट पड़ती ही रहती थी। सखू बाईं सब कुछ चुपचाप सहती थी। भोली-भाली सखू बाईं काम करते समय सदैव श्रीविठ्ठल के ( श्रीविठ्ठल अर्थात श्रीविष्णू का एक रूप, इनका महाराष्ट्र में पूजन किया जाता है ) स्मरण में लीन रहती थी। उनके मुख में सदैव पांडुरंग का (अर्थात श्रीविठ्ठल का) ही नाम रहता था।

एक बार आषाढी एकादशी के दिन पंढरपुर जाने वाली कीर्तन मंडली उनके गांव में पहुंची। कृष्णा नदी के तट पर कीर्तन मंडली ठहरी। वहां वारकरियों का अर्थात विठ्ठल भक्तों का भजन प्रारम्भ हुआ। एक महाराज कीर्तन करने लगे। भाग्य से उसी समय सखू बाई जी भी वहां नदी पर पानी भरने आ पहुंची । कीर्तनकार पंढरपुर की महिमा का वर्णन करने लगे। पांडुरंग की महानता गाने लगे। विठ्ठल का नाम सुनकर सखू बाई का ध्यान वहां गया और वे महाराज जी का कीर्तन सुनने में वह तल्लीन हो गई।

सभी वारकरियों को देखकर उन्हें भी पंढरपुर जाने का मन होने लगा और उनमें विठ्ठल दर्शन की तीव्र लगन उत्पन्न होने लगी । तभी उन्होंने निश्चय किया कि, कुछ भी हो; परन्तु मैं पंढरपुर अवश्य जाऊंगी । यह निश्चय कर सखू बाई जी ने अपनी गगरी पड़ोसन को देकर घर जाने के लिए कहा। वह मंडली के साथ ही आगे बढने लगी। श्रीविठ्ठलनाम के जयघोष में सखू बाई पूर्णरूप से भाव-विभोर हो गई थी। उसकी पड़ोसन ने घर पर सखू बाई जी की गगरी दी। सखू बाई की सासु माँ ने पड़ोसन से सखू बाई जी के बारे में पूछा, तब पड़ोसन द्वारा सम्पूर्ण बात बताए जाने पर सासु माँ अत्यंत क्रोधित हो गई, उसने तुरंत अपने पुत्र को बुलाया तथा सखू बाई को घर लाने की आज्ञा दी।

दिगंबर शीघ्र ही कीर्तन मंडली तक पहुंचा और सखू बाई जी को पीटते हुए घर ले आया और  उन्हें एक कक्ष में बंद कर दिया तथा उसे अन्न जल भी नहीं दिया गया । सखू बाई इस बात से अत्यंत दुःखी हो गई कि, अब उन्हें पांडुरंग के दर्शन नहीं होंगे । उसने पांडुरंग का नामस्मरण प्रारम्भ कर दिया । व्याकुल होकर वह पांडुरंग को पुकारने लगी।

बा रे पांडुरंगा। केव्हा भेट देसी।।
झाले मी परदेसी। तुजविण।।
तुजविण सखा। मज कोणी नाही।।
वाटते चरणी। घालावी मिठी।।
ओवाळावी काया। चरणावरोनी।।
तेव्हा चक्रपाणी। भेटशील।।

भावार्थ : पिता पांडुरंग, आप कब मिलोगे ? आपके बिना मैं अधूरी हो गई हूं। आपके बिना मेरा कोई मित्र नहीं। ऐसा लगता है कि, आपके चरणों से लिपट जाऊं। अपनी काया आप पर वार दूं, तभी भगवान चक्रपाणी आपसे भेंट होगी ! सखू बाई की निस्सीम भक्ति एवं उनके सरल और भोले भाव के कारण पांडुरंग उन पर प्रसन्न हो गए। पांडुरंग ने अपनी पत्नी देवी रुक्मिणी को सब  वृत्तांत कह सुनाया और स्त्री रूप धारणकर वे भक्त सखू बाई जी के पास आए । सखू बाई के बंद कक्ष में प्रवेश कर उस स्त्री रूप श्रीविठ्ठलनाथजी ने उसका हाल-चाल पूछा और स्वयं भी पंढरपूर की वारकरी हूं, ऐसा बताया, तब सखू बाई ने अपनी सारी व्याकुलता उसके सामने प्रकट की।

स्त्री ने उसे बताया, ‘तुम पंढरपूर जाकर लौट आओ। पांडुरंग के दर्शन कर आओ। तब तक मैं यहीं ठहरती हूं। यह सुनकर सखू बाई को बहुत आनंद हुआ । सखू बाई पंढरपुर पहुंची। पांडुरंग का रूप देखकर धन्य धन्य हो गई और सखू बाई जी ने वहीं अपने प्राण त्याग दिए। कीर्तन मंडली में उनके  गांव के लोगों ने उन्हें पहचान कर उनका अंतिम संस्कार किया। घर पर एकादशी के अगले दिन दिगंबर ने सखू बाई के कक्ष का द्वार खोला। सखू बाई के रूप में अवतरित साक्षात पांडुरंग सखू बाई के घर के सारे काम करने लगे ! सखू बाई रुपी भगवान्    सासु माँ द्वारा बताए सारे काम बिना विरोध के करने लगे। बैकुंठ में देवी रुक्मिणी चिंतित हो गई यदि सखू बाई लौटकर नहीं गई तो, श्रीविठ्ठल उसके घर में ही अटक जाएंगे।

रुक्मिणी ने सखू बाई की देह की राख एवं अस्थियां एकत्रित कर सखू बाई को जीवित किया और घर भेज दिया । सखू के घर पहुंचने के पूर्व ही उसे मार्ग में भगवान पांडुरंग मिले, जो सखू बाई  बनकर उसके घर में रह रहे थे । जिन गांववालों ने सखू बाई का अंतिम संस्कार किया था, वे सखू बाई के घर आए । तो क्या देखते हैं ? सखू बाई उन्हें घर में काम करते हुए दिखाई दीये । उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ ।

उन्होंने सखू के पती और सासु  माँ को सारी बात बताई, जिसे सुनकर उन्होंने सखू बाई को ही सत्य कथन करने के लिए कहा। सखू बाई ने सारी घटना बताई । यह सुनकर गांववाले स्तंभित हो गए । उसके पति और सासु माँ  को भी पश्चात्ताप हुआ ।

इस कथा का यह तात्पर्य है, सखू बाई का ईश्वर के प्रति जो अपार भक्तिभाव था और उनसे मिलने की जो तीव्र लगन थी यह देखकर स्वयं ईश्वर ही उससे मिलने आए ।

हम सभी के जीवन में भी यह घटना हो सकती है; परंतु इसके लिए सभी को ईश्वर का भावपूर्ण स्मरण करना चाहिए ।

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