दूर्वा और गणेश का अद्धभुत किस्सा



एक बार, यमपुरी में एक त्यौहार के दौरान बहुत सी अप्सराएं एवं नृत्यकाएं नृत्य कर रही थी, उनमे से एक अति-सुन्दर अप्सरा थी, जिसका नाम दुरूतमा था। जिसे देखकर यम मोहित हो गये। जिस कारण यम से एनलासुर (अग्नि राक्षस) उत्पन्न हुआ। वह आकाश के सामान विशालकाय था। उसने संसार में आतंक मचा दिया था। अपने मार्ग में आने वाली हर वस्तु को अपनी अग्नशक्ति से भस्म कर रहा था। उसे स्वर्ग की ओर बढ़ता देख सारे देवगण घबरा गये और भगवान विष्णु के पास गये। भगवान् विष्णु के साथ मिलकर सभी देवगण श्रीगणेशजी से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे और उनसे मदद माँगी। श्रीगणेशजी ने एक छोटे से बालक का रूप लिया और एनलासुर से युद्ध करने पहुँच गये। यह युद्ध कई दिनों तक चलता रहा सभी देवताओं ने भी गणेशजी का साथ दिया। अन्त में जब गणेशजी को युद्ध का अन्त होता नजर नहीं आया तो उन्होंने एनालसुर राक्षश को निगल लिया। हालांकि, इस कारण उनके पेट में अतिशय गर्मी ने जन्म ले लिया जिससे गणेशजी को बहुत पीड़ा सहनी पड़ी। भगवान इंद्र ने श्री गणेश को अपने माथे पर पहनने का चंद्रमा दिया ताकि उन्हें उस असहनीय पीड़ा से कुछ शांति मिल सके। यह उपयोग कारगर साबित नहीं हुआ। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने सिद्धि और रिद्धि नामक दो कन्याओं को उत्पन्न किया जिनको औषद्धियों का अद्भुत ज्ञान था, उनके द्वारा किये  गए अनेको उपचार के बाद भी उनकी पीड़ा और गर्मी में तनिक भी आराम ना मिल सका। तब वरुण देव ने समुंदरों के शीतल जल से अभिषेक करना शुरू कर दिया और भगवान शिव ने उन्हें एक हजार सर्प दिए जो गर्मी को दूर करने के लिए श्री गणेशजी के पेट के आसपास बांधे गये, परन्तु इससे भी पीड़ा में कोई आराम ना मिला । उसी समय 88,000 ऋषि पहुंचे और प्रत्येक ने 21 घास के तिनको के साथ श्री गणेश की पूजा-अर्चना की, तब कही जाकर उनकी अंदर की आग शांत हुई और उन्हें उस असहनीय अग्नि और पीड़ा से आराम मिला।

तभी से दूर्वा घास गणेशजी की पूजा-अर्चना की मुख्य सामग्रियों में गिना जाता है।

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