क्यों नारियल को पूजा जाता है ?



नारियल की महत्वता !
सनातन धर्म में वैसे तो सभी फल किसी न किसी देवी-देवता को अर्पित किये जाते है। परन्तु सभी फलो में सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है नारियल को, आईये आज जानते है कि क्या कारण है जिस वजह से नारियल का महत्व इतना बढ़ा और लोग इसे श्रीफल भी कहने लगे तथा ऐसा क्यों है कि बिना नारियल कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं माना जाता है।

इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जिसके अनुसार नारियल का इस धरती पर अवतार ऋषि विश्वामित्र द्वारा हुआ। आईये आज आपको नारियल के जन्म की कथा से अवगत कराते है।

प्राचीन काल में एक राजा हुए, जिनका नाम था राजा सत्यव्रत ! राजा सत्यव्रत बड़े ही बहादुर और प्रतापी राजा थे । उनके मुख का तेज इतना था की उनकी एक दहाड़ से दुश्मन कापते थे । राजा स्वभाव से बड़े ही शांत और ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास रखते थे। वे आदि शक्ति के उच्कोटि के भक्त थे, चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाये, पर वे सुबह-शाम देवी की आराधना और उपासना करने से नहीं चूकते थे।  देवी भी अपने भक्त से बहुत प्रसन्न थी और देवी की विशेष कृपा से राजा सत्यव्रत को कोई कमी नहीं थी। भरा-पूरा परिवार, बहादुर सेना और सुशासित राज्य, ये सब देख राजा का मन हमेशा प्रफुल्लित रहता था। पर कोई नहीं जनता था की राजा के मन में एक इच्छा ऐसी थी जिसे वे मन में ही दबाये रहते थे। जितना राजा अपनी इच्छा को दबाते, वो उतने ही तेज वेग से राजा के मन को कचौटती।

राजा की इच्छा थी स्वर्गलोक जाने की, पर राजा को स्वर्गलोक जाने के तरीका नहीं पता था। राजा किसी भी हाल में आपने मन में दबी इस इच्छा को पूरा करना चाहते थे। स्वर्गलोक की सुंदरता उन्हें अपनी और आकर्षित करती थी। किन्तु वहाँ कैसे जाना है,यह राजा सत्यव्रत नहीं जानते थे। एक दिन राजा ने निश्चय किया की वे देवी की कठोर आराधना करेंगे और देवी से ही स्वर्गलोक जाने का रास्ता पूछेंगे।

एक शुभ दिन उन्होंने देवी की आराधना शुरू की और कुछ ही समय में देवी प्रकट हुई और उनकी इस दुविधा का हल बताया। देवी ने कहा महर्षि विश्वामित्र ही उन्हें स्वर्ग का रास्ता बता सकते है।

तब राजा सत्यव्रत महर्षि विश्वामित्र के आश्रम की तरफ चल दिए। वहाँ पहुंच कर पता चला  की ऋषि विश्वामित्र तपस्या करने आपने घर से काफी दूर निकल गए है और लम्बे समय से लौटे भी नही है। उनकी अनुपस्थि में क्षेत्र में सूखा पड़ गया है। विश्वामित्र के आश्रम के लोग और उनका परिवार भूखा-प्यासा भटक रहा था। तब राजा ने उनके परिवार की सहायता की और उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी अपने कंधो पर ली।

संयोग से महर्षि कुछ दिनों बाद वापिस लौटे तो उन्हें, उनके परिवार वालो ने सारा हाल कह सुनाया। ऋषि विश्वामित्र राजा की सेवा से प्रसन्न हुए और अपने परिवार की देख रेख के लिए धन्यवाद् किया और राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने महर्षि से एक अनोखा वरदान मांगने की अनुमति मांगी और महर्षि ने उन्हें आज्ञा दे दी। 

राजा बोले की उन्हें स्वर्गलोक जाना है और महर्षि उन्हें वहाँ जाने का रास्ता बताये या अपनी शक्तियों से स्वर्ग की तरफ जाने वाला एक मार्ग बनाये। विश्वामित्र नेअपने परिवार की सहायता का उपकार मानते हुए, जल्दी ही राजा के लिए एक ऐसा मार्ग बनाया जो पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक की ओर जाता था। राजा सत्यव्रत ये देख बड़े ही प्रसन्न हुए और उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा। आज उन्हें अपने मन की इच्छा पूर्ण होती नजर आई। 

राजा सत्यव्रत उस मार्ग पर चलते हुए स्वर्गलोक के द्वार पर जैसे ही पहुंचे, वहाँ स्वर्गलोक के देवता इंद्र ने उन्हें धोखे से धकेल दिया। जिससे राजा सत्यव्रत धरती पर आ गिरे। राजा रोते हुए महर्षि विश्वामित्र के पास गए और सारी घटना का वर्णन किया। देवताओ के इस तरह के व्यवहार से विश्वामित्र क्रोधित हुए और देवताओ से उनके इस व्यवहार पे खेद जताया। देवताओ से वार्तालाप कर और आपसी सहमति से विश्वामित्र द्वारा एक हल निकला गया। राजा सत्यव्रत के लिए अलग से एक स्वर्गलोक के निर्माण का आदेश दिया गया।

ये दूसरा स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और देव स्वर्गलोक के मध्य में स्थापित किया गया, ताकि राजा सत्यव्रत को कोई भी परेशानी ना हो और देवी देवताओ को भी किसी कठनाई का सामना ना करना पड़े। परन्तु महर्षि विश्वामित्र को एक बात परेशान करने लगी। उन्हें लग रहा था की धरती और स्वर्गलोक के बीच में होने के कारण हवा के जोर से अगर नया स्वर्गलोक डगमगा ना जाये। यदि ऐसा हुआ तो राजा फिर से धरती पर ना आ गिरे।

इसका हल निकालते हुए ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्गलोक के ठीक निचे एक खम्बे का निर्माण किया, जिससे नए स्वर्गलोक को सहारा मिला। माना जाता है की खम्बा समय के साथ एक पेड़ के मीठे तने के रूप में बदल गया और राजा सत्यव्रत की मृत्यु के बाद, सत्यव्रत का सर एक फल बन गया ! इस पेड़ के तने को नारियल का पेड़ और राजा के सिर को नारियल कहा जाने लगा। इसीलिए आज के समय में नारियल का पेड़ काफी लम्बा होता है और नारियल का फल भी ऊंचाई पर लगता है !

इस कथा के अनुसार एक समय आने पर राजा सत्यव्रत को एक ऐसे इंसान की उपाधि दी गयी, जो ना धरती का था और ना ही स्वर्गलोक का, यानी की एक ऐसा इंसान जो दो धुरो के बीच में लटका हुआ था और वो मनुष्य भी था और देवता भी। नारियल को स्वर्ग का वासी मानते है और देवो के साथ पूजते है।

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