श्री राम के अलावा इन 5 से भी हार गया था रावण |



बालि से रावण की हार
एक बार रावण बालि से युद्ध करने के लिए पहुँच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकारने लगा, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न होने लगी।रावण के ऐसा बार-बार करने पर बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा पूर्ण की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से अपने आप को आजाद नहीं करा पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था।

सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार
सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो उसने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। उसने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और फिर पानी को छोड़ दिया, जिससे रावण और उसकी पूरी सेना नर्मदा के बहाव में बह गई। इस पराजय के बाद एक बार फिर रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंच गया, तब सहस्त्रबाहु ने उसे बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया था।

राजा बलि के महल में रावण की हार
दैत्यराज बलि पाताल लोक के राजा थे। एक बार रावण राजा बलि से युद्ध करने के लिए पाताल लोक में उनके महल तक पहुंच गया था। वहाँ पहुँचकर रावण ने बलि को युद्ध के लिए ललकारा, उस समय बलि के महल में खेल रहे बच्चों ने ही रावण को पकड़कर घोड़ों के साथ अस्तबल में बाँध दिया था। इस प्रकार राजा बलि के महल में रावण की हार हुई।

शिवजी से रावण की हार
रावण बहुत शक्तिशाली था और उसे अपनी शक्ति पर बहुत घमण्ड था। रावण इस घमंड के नशे में शिवजी को हराने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुँच गया था। रावण ने शिवजी को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन महादेव तो ध्यान में लीन थे। रावण कैलाश पर्वत को उठाने लगा। तब शिवजी ने पैर के अंगूठे से ही कैलाश का भार बढ़ा दिया, इस भार को रावण उठा नहीं सका और उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया। बहुत प्रयत्न के बाद भी रावण अपना हाथ वहां से नहीं निकाल सका। तब रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उसी समय शिव ताण्डव
स्रोत रच दिया। शिवजी इस स्रोत से बहुत प्रसन्न हो गए और उसने रावण को मुक्त कर दिया।  मुक्त होने के पश्चात रावण ने शिवजी को अपना गुरु बना लिया।

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