कैसे तोडा भगवान् ने अहंकार अपने भक्तो का |



अहंकार व्यक्ति के विवेक (सोचने-समझने की शक्ति) का नाश कर देता है। सतयुग से लेकर द्वापर तक जब भी किसी ने अपना विवेक खोया तब-तब उसका सर्वनाश ही हुआ जैसे- रावण, दुर्योधन, पर यही अहंकार जब भगवान् के भक्तो को घेरता है तो भगवान् स्वयं उनका अहंकार तोड़ते है। इसी अहंकार से जुडी एक रोचक कथा आज हम आपके समक्ष लेकर आये है।  

एक बार भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। श्रीकृष्ण के निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी विराजमान थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु ! आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या सीता मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं ? द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरूड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है ? इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि, हे प्रभु ! मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है ?

भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। वे जान गये थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट करने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरूड़ से कहा कि हे गरूड़ ! तुम हनुमानजी के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरूड़, भगवान की आज्ञा पाकर हनुमानजी को बुलाने चल पड़े।

इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि हे देवी ! आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।

भगवान की आज्ञा पाकर सुदर्शन चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए। गरूड़ ने हनुमानजी के पास पहुंचकर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ ! भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।

हनुमानजी ने विनयपूर्वक गरूड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूँ। गरूड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा ? खैर मैं भगवान के पास चलता हूँ। यह सोचकर गरूड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़े। 

पर यह क्या ? महल में पहुंचकर गरूड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरूड़ का सिर लज्जा से झुक गया।

तभी श्रीराम ने हनुमानजी से कहा कि पवनपुत्र ! तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए ? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं ? हनुमानजी ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया।

हनुमानजी ने कहा कि प्रभु ! आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें।

भगवान मन ही मन मुस्कुराने लगे। हनुमानजी  ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया- हे प्रभु ! आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है ?

अब रानी सत्यभामा का अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरूड़जी तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए।

सभी ने कहा प्रभु अद्भुत लीला आपकी ! अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त द्वारा ही दूर किया। आपकी जय हो प्रभु !

ये अहंकार ही इंसान और भगवान् के मिलन में बाधा है इसीलिए सदैव मन्दिर में सिर झुकाकर आने का नियम बनाया गया था।

||जय श्री राम ||

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