साधुता से लालच पर विजय


कुछ समय पूर्व एक बहुत ही पहुंचे हुए महात्मा हिमालय की तलहटी में निवास करते थे। अपने गुरु की आज्ञा से वे गाँव-गाँव में घूमकर अपने ज्ञान की गंगा पुरे देश में प्रवाहित कर रहे थे। वे किसी भी गाँव में अपना डेरा डालते और फिर वहाँ के लोगो में ज्ञान-रूपी गंगा का समावेश करते और अगले गाँव की और निकल पड़ते।

एक बार महात्मा घूमते-घूमते एक शहर के पास पहुंचे। लेकिन रात हो जाने के कारण शहर का दरवाज़ा बन्द हो गया था। महात्मा ने रात वही व्यतीत करके सुबह-सवेरे शहर में प्रवेश करने का विचार किया और वही दरवाज़े के पास बिछोना बिछाकर लेट गए।

उसी रात लम्बी बीमारी के चलते उस राज्य के राजा की मृत्यु हो गई। राजा के कोई संतान नहीं थी। इसीलिए राजगद्दी पर बैठने के लिए पूरा राज-परिवार झगड़ने लगा। सभी राजा के सिंहासन पर अपना अधिकार जताने लगे। राजगद्दी के लिए होने वाले झगडे का कोई हल न निकलते देख राज-दरबारियों ने एक अनोखा निर्णय लिया।

राज-दरबारियों ने सर्व-सहमति से यह निर्णय लिया की अगले दिन सुबह शहर का दरवाजा खुलने पर जो व्यक्ति सबसे पहले शहर के अन्दर कदम रखेगा उसी को राज्य का राजा घोषित कर दिया जाएगा। सभी ने राज-दरबारियों के इस निर्णय को स्वीकार कर लिया।

अलगे दिन सुबह जैसे ही शहर का दरवाजा खुला, महात्मा अपना बिछोना उठा कर शहर के अन्दर की और चल पड़े। जैसे ही महात्मा ने शहर के अन्दर कदम रखा पूरा शहर महात्मा की जय-जयकार करने लगा। राज-दरबारी महात्मा को आदर पूर्वक महल में लेकर आए। महात्मा को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।

महात्मा ने राज-दरबारियों से इस आदर सत्कार और जय-जयकार का कारण पुछा तो राज-दरबारियों ने महाराज की मृत्यु के बाद उत्पन्न हुए विवाद और उस विवाद के हल के लिए सबसे पहले शहर में आने वाले व्यक्ति को राजा बनाने की बात महात्मा जी को बता दी।

महात्मा जी को पूरी बात समझ आ गई। उन्होंने राज्य की प्रजा और राज-दरबार द्वारा दिए गए आदर-सत्कार को स्वीकार किया और स्नान करके राजा की पोशाक पहन ली। राजगद्दी पर बेठने के बाद महात्मा ने नोकरों को एक बक्सा लाने का आदेश दिया और बक्से में अपनी धोती, पीताम्बर और वस्त्र रख कर उसे बन्द करके  सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया।

अब महात्मा एक राजा की तरह अपना राज-पाठ चलाने लगे।  महात्मा जी को धन, लोभ और वैभव से कोई मोह तो था नहीं सो वे निष्काम भाव से इस कार्य को प्रभु इच्छा समझ कर राज्य की सेवा करने लगे। महात्मा जी के राज-पाठ सँभालने के बाद राज्य की प्रजा ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन यापन करने लगी जिसके परिणाम स्वरुप कुछ ही दिनों में राज्य की काफी उन्नति हो गई।

अब राज्य में कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं था। पूरा राज्य महात्मा जी के राजा बनने से खुश था। राज्य की उन्नति से राज्य का खजाना भी भर गया।

राज्य की खुशहाली और उन्नति देखकर आस पास के राज्य के राजाओं की नज़र राज्य पर पड़ने लगी। उन्होंने सोचा की महात्मा जी को राज करना तो आता है लेकिन युद्ध करना नहीं। अगर महात्मा जी के राज्य पर आक्रमण कर दिया जाए तो इतने समृद्ध राज्य को आसानी से जीता जा सकता है।

बस यही सोच कर राज्य के पड़ोसी राजा ने राज्य पर चढाई कर दी। राज्य की और दूसरे राज्य की सेना को आते देख सेनापति ने राजा को पड़ोसी राज्य के आक्रमण की सुचना दी। सेनापति की बात सुनकर महात्मा जी ने किसी भी तरह की सैन्य कार्यवाही करने से इनकार कर दिया और कहा की “धन-सम्पदा के लिए प्राणों की आहुति देना का कोई औचित्य नहीं है”।

कुछ ही देर में सेनापति महात्मा के पास फिर समाचार लेकर आया की, महाराज! क्षत्रु की सेना राज्य की सीमा में प्रवेश कर चुकी है, अगर आप अब भी आक्रमण का आदेश नहीं देंगे तो क्षत्रु  राज्य में प्रवेश कर जाएगा। सेनापति के बात सुनकर महात्मा ने फिर किसी भी प्रकार की सैन्य कार्यवाही से इंकार कर दिया।

जब पडोसी राज्य की सेना राज्य के समीप आ गई तो महात्माजी ने सेनापति के हाथों "यहाँ आने का कारण बताने का सन्देश भिजवाया"। महात्मा का सन्देश पाकर पड़ोसी राज्य के राजा ने सन्देश भिजवाया की, "हम यहाँ आपका राज्य लेने आए हैं"

महात्मा मुस्कुराए और बोले, "राज्य के लिए युद्ध करना और इतने सारे सैनिकों का बलिदान लेना सही नहीं है। धन-सम्पदा और राज-पाठ के लिए युद्ध करना सही नहीं हैं। अगर तुम इस राज्य की सेवा करना चाहते हो तो में ख़ुशी-ख़ुशी  यह राज्य तुम्हें सोंपता हूँ।"

महात्मा ने उसी वक़्त सैनिको को वह बक्सा लाने का आदेश दिया। बक्से से उन्होंने अपने साधू का वेश निकाला, हाथों में कमण्डल लिया और पड़ोसी राज्य के राजा को राज्य सोंपते हुए कहा, “इतने दिनों तक इस राज्य की सेवा मैंने की अब आप करें… जब मैं इस राज्य में आया था तब इस राज्य को सँभालने वाला कोई नहीं था। अब आप इस राज्य को सँभालने की ज़िम्मेदारी ले रहें हैं, तो मैं फिर से प्रभु कार्य में संलग्न हो पाऊँगा। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।"

राजा को महात्मा के साधुवाद ने इतना प्रभावित किया की राजा ने महात्मा के राज-पाठ को अपने हाथों में लेकर राज्य का पूर्ण व् सुचारू रूप से गठन किया। देखते ही देखते वह राज्य देश का सबसे खुशहाल राज्य बन गया।

साथियों, कहानी "साधुता से लालच पर विजय" का उद्देश्य यह नहीं है कि क्षत्रु के सामने अपना सबकुछ रख दो बल्कि कहानी का उद्देश्य यह है की महात्मा की तरह जो भी काम सामने आ जाए उसे निष्काम भाव से प्रभु इच्छा समझ कर, अच्छे से करो। सही मन से किया गया काम कभी भी गलत परिणाम लेकर नहीं आता।

Comments

Popular Posts

महाभारत के युद्ध में भोजन प्रबंधन |

मृत्यु से भय कैसा ?

कुसङ्ग से हानि एवं सुसङ्ग से लाभ