अष्टावक्र गीता के पीछे का सच - गीता के 60 प्रकार में से एक।



ये तो हम सभी को ज्ञात है कि मिथिला के सभी राजाओं को जनक कहा जाता था। उनमें से एक राजा जनक, जिनको आत्मज्ञान होने से पहले वे एक पंडित के द्वारा शास्त्रों का ज्ञान ले रहे थे, पंडित ने एक पद पढ़ा -

"घोड़े की एक रकाब में पैर डालने के बाद में दूसरा पैर डालने में जो समय लगता है केवल मात्र उतने समय में ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। "

यह सुनते ही राजा जनक ने पुछा कि क्या यह बात सत्य है। पंडित ने कहा कि ये पूर्णतया सत्य है और इसमें कोई संदेह नहीं किया जा सकता। राजा ने तुरंत अपना घोडा मंगवाया ताकि शास्त्रों की सत्यता को रखा जा सके और यदि ऐसा नहीं हुआ तो पंडित को इसका उत्तरदायी ठहराया जाये। पंडित ने कहा कि वह सिद्ध तो नहीं कर सकता परन्तु शास्त्रों में लिखी कोई भी बात गलत नहीं होती इस बात पर वह पूर्ण रूप से विश्वास करता है और राजा को भी करना चाहिए।

इस पर राजा ने उसे बंदी बनाकर कैद करवा दिया और उसके बाद राज्य से बहुत से पंडितों को बुलवाया और कहा कि या तो इसे सिद्ध करो या फिर शास्त्रों में से इस बात को हटाकर शास्त्रों को सही करो क्योंकि शास्त्रों में कोई गलत बात नहीं होनी चाहिए। इस पर सभी पंडितों का एक ही उत्तर था कि शास्त्रों में लिखा है तो सत्य ही है परन्तु सिद्ध नहीं कर सकते। इस पर राजा ने उन सभी को भी कैद करवा दिया।

राजा जनक ने पड़ोसी राज्यों में रहने वाले सभी पंडितों को भी ये सूचना भिजवाई परन्तु कोई भी इस बात को सिद्ध करने में समर्थ नहीं था। अतः बहुत से पंडित तो कैद होने के डर से मिथिला राज्य में आने से भी कतराने लगे।

थोड़े दिन बीत जाने के बाद मुनि अष्टावक्र मिथिला राज्य के पास से गुजरे, विश्राम के उद्देश्य से उन्होंने एक वृक्ष की छाँव में आश्रय लिया। कुछ समय में वहां से दो पंडित गुजरे तो मुनिवर ने उन्हें मिथिला के राजा के बारे में पुछा और मिलने की अभिलाषा जतायी। इस पर पंडितों ने उन्हें बताया कि कोई भी पंडित या साधु राजा के पास नहीं जाना चाहते क्योंकि राजा जाते ही एक ही प्रश्न पुछते हैं - "क्या तुम ये सिद्ध कर सकते हो कि घोड़े की रकाब में एक पैर रखने के बाद दूसरा पैर रखने जितने समय में आत्मज्ञान की प्राप्ति हो सकती है?"और सिद्ध न कर पाने की अवस्था में राजा उन्हें कैद में डाल देता है।

यह सुनने पर अष्टावक्र जी ने कहा कि यह तो गलत बात है और पुछा यदि दोनों पंडित उन्हें एक पालकी में बैठाकर राजा के समक्ष ले जा सकते हैं क्या? दोनों पंडित मुनिवर की बात मान गए और पालकी में बैठाकर मुनिवर अष्टावक्र जी को राजा के दरबार में राजा के समक्ष ले गए। मुनिवर के मुख का तेज देखकर राजा ने तुरंत अपने आशन से उठकर उनका स्वागत किया और तुरंत उनके सामने साष्टांग दंडवत हो गए। दंडवत मुद्रा में ही राजा ने मुनिवर से उनके आने का उद्देश्य पुछा और आग्रह किया यदि उनके लिए कुछ कर सकें।

मुनि अष्टावक्र ने पुछा कि राजा आपने सभी पंडितों को कारागृह में क्यों डाल दिया? इस पर राजा ने सारी स्थिति से मुनिवर को अवगत करवाया। जिसके बाद मुनिवर ने राजा से कहा कि शास्त्रों की बात पर संदेह नहीं किया जा सकता उनमें जो भी लिखा है सभी कुछ शत-प्रतिशत सत्य है। राजा ने मुनिवर से इसे सिद्ध करने का आग्रह किया और घोड़ा मंगवाने के लिए आज्ञा मांगी। तब अष्टावक्र जी ने राजा से कहा कि क्योंकि उनकी अभिलाषा सच्ची और सही है अतः वह अवश्य ही इस बात को सही सिद्ध करके शास्त्रों की सत्यता का प्रमाण देंगे। परन्तु उससे पूर्व आपको सभी पंडितों को कारागृह से मुक्त करना होगा और घोड़े की पीठ पर बैठकर वन में चलना होगा। राजा जनक ने मुनिवर की बात मान ली और वन के लिए प्रस्थान को तैयार हो गए। मुनिवर वापस अपनी पालकी में बैठ गए और सभी ने वन के लिए प्रस्थान किया।

वन में पहुंचकर मुनिवर एक बरगद के पेड़ के नीचे रुके और राजा से कहा कि अपने साथ में आये सभी सिपाहियों तथा मंत्रीगणों को वापस लौटा दे क्योंकि उपदेश तो राजा को लेना है फिर इन सब का यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है। राजा ज्ञान प्राप्ति के लिए बहुत अधिक व्याकुल थे सो उन्होंने तुरंत ही सभी को वापस राज्य लौटने का आदेश दिया। सभी के लौटने के बाद राजा ने मुनिवर से आज्ञा ली और एक पैर घोड़े की रकाब पर रखा और दूसरा पैर रखने के लिए मुनिवर के आदेश की प्रतीक्षा करने लगे।

मुनिवर ने राजा को रोका और कहा कि क्या शास्त्र में सिर्फ यही लिखा था कि आत्मज्ञान की प्राप्ति घोड़े की रकाब में पहला पैर रखने के बाद दूसरा पैर रखने जितने समय में हो जाती है या इसके अलावा भी कुछ लिखा था। इस पर राजा ने कहा बहुत सी और भी बातें लिखी थी। मुनिवर ने पूछा क्या उसमे लिखा था की आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए एक गुरु भी आवश्यक है? इस पर राजा ने हाँ कहा। मुनिवर ने पुनः पूछा कि यदि ऐसा है तो फिर आपने मुझे गुरु माने बिना मुझसे दीक्षा के लिए क्यों कहा? तब राजा ने शास्त्रानुसार अष्टावक्र जी को अपना गुरु मान लिया। अष्टावक्र जी ने राजा से गुरु दक्षिणा के लिए कहा। इस पर राजा राजी हो गए। तब अष्टावक्र जी ने कहा कि मुझे गुरु दक्षिणा में आपका शरीर, मन, सारी संपत्ति और जो कुछ भी इस संसार में आपके पास है चाहिए। जैसे ही ये शब्द राजा ने सुने अष्टावक्र जी जाकर पास की झाड़ियों में छुप गए। राजा बिना किसी हलचल के अपना एक पैर घोड़े की रकाब में रखे मूर्ति समान वहां खड़े थे। सूर्यास्त होने लगा और राजा के महल नहीं लौटने पर मंत्रीगण चिंतित हो गए। तुरंत कुछ सिपाही और मंत्रीगण राजा को ढूंढने वन में पहुंचे और देखा की राजा तो मूर्तिवत खड़े हैं और अष्टावक्र जी कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे। सभी मंत्रियों ने सोचा जरूर अष्टावक्र जी ने ही कुछ कर दिया है राजा को। राजा को महल लाया गया परन्तु महल आने पर भी राजा उसी अवस्था में रहे।

राजा की इस स्थिति को देखकर सभी काफी चिंता में थे तभी रानी ने आदेश दिया कि जाकर अष्टावक्र जी को ढूंढकर लाया जाये क्योंकि अगर राजा का ये हाल उन्ही के कारण है तो वही इसे पुनः सही कर पाएंगे। इस पर अष्टावक्र जी की तलाश शुरू हुयी। क्योंकि राजा न कुछ खा रहे थे न ही एक शब्द बोल रहे थे।

दूसरे दिन सूर्यास्त के समय एक नौकर मुनिवर को लेकर उनकी पालकी में महल पहुंचा। मुनिवर को देखते ही मंत्रीगणों को बहुत क्रोध आया परन्तु कहीं काम बिगड़ न जाये इस डर से उन्होंने क्रोध को व्यक्त नहीं होने दिया क्योंकि केवल मात्र मुनि अष्टावक्र जी ही राजा को ठीक कर सकते थे।

मुनिवर ने जैसे ही राजा के पास जाकर कहा "राजा!" राजा तुरंत खड़े हुए और बोले, "क्या आदेश है स्वामी? क्या मैंने आपके विरुद्ध कुछ किया?" मुनिवर बोले, "किसने कहा कि आपने मेरे विरुद्ध कुछ किया? आपने कुछ नहीं किया। सब ठीक है। उठो और खाना खाओ।" राजा उठे खाना खाया और पुनः अचल बैठ गए। इस पर मंत्रियों ने कहा मुनिवर हम पर दया करें और राजा को पुनः पहले जैसे कर दें। मुनिवर ने मंत्रियों को राजा को ठीक करने वचन दिया और उन्हें बाहर जाने को कहा। तत्पश्चात मुनिवर ने द्वार भीतर से बंद कर दिए। तुरंत ही राजा ने कहा, "स्वामी मेरा मेरे शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं रहा गया है। मेरा राज्य मेरा नहीं रह गया है। मेरे हाथ, पैर और सभी इन्द्रियां भी मेरे बस में नहीं हैं मैंने सच्चे हृदय से सब कुछ आपके सुपुर्द कर दिया है। इसी कारण मैं इस अवस्था में हूँ।"

इस तरह के सत्य और समर्पण से भरे शब्द सुनकर मुनिवर प्रसन्न और संतुष्ट हुए और राजा के सिर पर हाथ रखकर बोले, "हे राजन मुझे तुम्हे यह प्राथमिक उपचार देना पड़ा ताकि मैं ये जान सकूँ कि तुम मुक्ति के योग्य हो या नहीं। तुम अब उपदेश लेने योग्य शिष्य बन गए हो। अब तुम ब्रह्म स्वरुप हो गए हो, एक मुक्त आत्मा जिसने वो सब कर लिया जो करना चाहिए था, वो सब ग्रहण कर लिया जो ग्रहण करना चाहिए था।"

राजा ने पूछा, "हे स्वामी, मुझे बताएं कि कैसे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, कैसे मुक्ति को प्राप्त किया जा सकता है और कैसे वैराग्य की प्राप्ति हो सकती है?"

इसी प्रकार से राजा और मुनि अष्टावक्र जी के बीच की इस पूरी वार्तालाप को "अष्टावक्र गीता" कहा जाता है जिसमे संपूर्ण उपदेश राजा और मुनिवर के प्रश्न और उत्तरों के रूप में संगृहीत हैं।


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