भारत के रहस्यमय मन्दिर - 1: श्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरी, ओडिशा



जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि हमारा देश विविधताओं का देश है, इन्ही विविधताओं में कई ऐसे रहस्य है जो पहेली बनकर हम सभी के सामने खड़े है। जिन्हें आज तक सुलझाया नहीं जा सका है। कुछ रहस्यात्मक चमत्कार जो आज हमें ज्ञात हैं, वे सनातन धर्म के कुछ मन्दिरों से जुड़े हैं। आज तक भी कई ऐसे अन-सुलझे रहस्य है जिनका विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं है। जिन्हे देखकर लगता है कि इनके पीछे अवश्य ही कोई अलौकिक शक्ति विध्यमान है।

यह लेख हमारे देश के ऐसे अन-गिनत मन्दिरों के रहस्यों से आपको अवगत करवाने की एक शुरुआत है, इस श्रंखला में आप हिंदुस्तान के अद्भुत मन्दिरों के इतिहास, वर्तमान तथा उनसे जुड़ी रहस्यमय घटनाओं के बारे में जानेंगे।

इतिहास- श्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरी, ओडिशा-
इस मन्दिर का निर्माण 12वीं शताब्दी ईसा पूर्व में गंगावंश के राजा अनन्तवर्मन चोड़गंगा द्वारा करवाया गया था। इसका प्रमाण इनके वंशज नरसिम्हा देव द्वितीय के केंदुपटना के ताम्र-शिलालेख से मिलता है। अनन्तवर्मन मूलरूप से शैव थे, और 1112 ईस्वी में उत्कल क्षेत्र (जिसमें मंदिर स्थित है) पर विजय प्राप्त करने के कुछ समय बाद वे वैष्णव बन गए। 1134-1135 ईसा पूर्व के एक शिलालेख से इनके द्वारा मन्दिर को दिए गए दान का पता चलता है। एक अनुमान के अनुसार यह कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण 1112 ईसा पूर्व के बाद शुरू हुआ।

मन्दिर के इतिहास की एक अन्य कहानी के अनुसार इस मन्दिर की स्थापना अनंगभीम देव द्वितीय ने करवाई थी। अन्य अलग-अलग प्रचलित कुछ कहानियों के अनुसार यह मन्दिर 1196, 1197, 1205, 1216 या 1226 ईसा पूर्व का बताया जाता है। इससे एक अंदाज़ा यह लगता है कि इस मन्दिर का पूर्ण निर्माण अथवा जीर्णोद्धार अनन्तवर्मन के बेटे अनंगभीम के शासनकाल में हुआ था। मन्दिर परिसर को बाद के राजाओं के शासनकाल के दौरान विकसित किया गया था, जिसमें गंगावंश और सूर्यवंशी (गजपति) वंश भी शामिल थे।

मन्दिर के देवी-देवता-
मन्दिर में (तीन देवी-देवता) श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र और सुभद्रा का पूजन होता है। मन्दिर के गर्भगृह में पवित्र नीम की लकड़ियों से उकेरी गई, तीनों मूर्तियों को रत्नजड़ित एक मंच पर सुदर्शन चक्र, मदनमोहन, श्रीदेवी तथा विश्वधात्री की मूर्तियों के साथ रखा गया है। सभी देवी-देवताओं को मौसम के अनुसार अलग-अलग कपड़ो और गहनों से सजाया जाता है।

किवंदतियाँ-
एक अनुमान के अनुसार प्रथम जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण राजा इन्द्रद्युम्न के द्वारा करवाया गया था। पौराणिक दृष्टांत जैसा कि स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य पुराण तथा बाद में ओड़िया में कहा गया है कि श्री जगन्नाथ की पूजा एक विश्वावसु नामक आदिवासी प्रमुख भगवान नीला माधब के नाम से करता था। राजा इन्द्रद्युम्न ने एक पण्डित विद्यापति को भगवान नीला माधब की खोज करने भेजा। लेकिन विद्यापति कुछ पता नहीं कर पाए तो उसने विश्वावसु की बेटी से शादी कर ली। कई बार कहने के बाद विश्वावसु एक दिन विद्यापति की आँखों पर पट्टी बांध कर उसे देवता के दर्शन करवने एक गुफा में ले गये।

विद्यापति ने चालाकी से बीच रस्ते में सरसों के बीज डाल दिए ताकि वो बाद में उग जाये और पुनः देवता की गुफा तक आसानी से पहुंचा जा सके। जब राजा इन्द्रद्युम्न को बताया गया तो, वह देवता की पूजा करने आये, परन्तु वहाँ से मूर्ति गायब हो गयी। देवता मिटटी में समा गए थे। राजा को बहुत हताशा हुई।

राजा ने दर्शन के बिना न लौटने का प्रण लिया और व्रत करने बैठ गए। तभी एक आकाशीय आवाज़ आयी - "तू उसे देख लेगा", बाद में राजा ने एक घोड़े की बलि देकर विष्णु मंदिर बनवाया और नारद द्वारा लायी गयी श्री नरसिम्हा की मूर्ति की स्थापना करवायी। राजा को सपने में श्री जगन्नाथ के दर्शन हुए और एक आवाज़ सुनाई दी जिसने कहा कि समुद्र किनारे एक सुगन्धित पेड़ से लकड़ी तोड़कर उससे मूर्ति बनाओ। राजा ने उस दिव्य पेड़ की लकड़ी से श्री जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की मूर्तियां बनाकर मंदिर में स्थापित करवाई।

श्री जगन्नाथ की रहस्यमय बातें-
इस प्रसिद्ध मदिर के कुछ ऐसे रहस्य हैं जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पूर्णतया असंभव है। आइये इन रहस्यों के बारे में संक्षेप में जानते हैं-

मन्दिर शिखर पर लगा ध्वज-
मन्दिर पर लगा ध्वज सदैव हवा की विपरीत दिशा में लहराता है जो कि साफ़ तौर से विज्ञान के सिद्धान्तों को गलत साबित करता है। वैज्ञानिकों के द्वारा काफी जाँच पड़ताल के बाद भी यह रहस्य-रहस्य ही है। इस ध्वज को रोज़ एक पुजारी 45 फुट की ऊंचाई पर चढ़कर बदलता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अगर ध्वज को रोज़ नहीं बदला गया तो मंदिर को पुरे 18 वर्ष के लिए बन्द करना पड़ेगा। ध्वज बदलने की ये परंपरा 1800 वर्षो से चली आ रही है।

मन्दिर शिखर पर लगा सुदर्शन चक्र-
मन्दिर शिखर पर लगे सुदर्शन चक्र की ऊंचाई करीब 20 फुट है और वजन लगभग एक टन। इस चक्र की खास बात यह है कि इसे पुरी शहर की किसी भी जगह से देखा जा सकता है और इसे इस प्रकार लगाया गया है कि किसी भी तरफ से देखें यह एक जैसा ही दिखेगा और आपको ऐसा प्रतीत होगा की अभी भी उसका फेस आपकी ही तरफ है।

इसे लगाने के तरीके के पीछे की कला आज तक समझी नहीं जा सकी है कि इसे किस प्रकार यहाँ लाया गया होगा और कैसे इसे मन्दिर के शिखर पर लगाया गया होगा।

मन्दिर की वास्तुकला-
श्री जगन्नाथ मन्दिर की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि इसके मुख्य गुम्बद की परछाई कभी नहीं बनती है जो उस समय की उन्नत वास्तुकला को नायाब नमूना है।

हवा की दिशा-
धरती पर बाकि सभी जगह दिन में हवा की दिशा समुद्र से जमीन की तरफ तथा रात में जमीन से समुद्र की तरफ होती है परन्तु यहाँ पर इसका उल्टा होता है जिसका अभी तक कोई वैज्ञानिक कारण पता नहीं चला है।

मन्दिर के ऊपर कोई विमान या पक्षी नहीं उड़ता-
श्री जगन्नाथ मन्दिर के ऊपर से आपको ना तो कोई हवाईजहाज उड़ता नज़र आएगा और न ही कोई पक्षी। जबकि आज हम अपने आस पास देखेंगे तो हमें लगभग हर ऊँची इमारत पर पक्षी बैठे दिख जायेंगे परन्तु यहाँ पर पक्षी न बैठने का कोई वैज्ञानिक कारण नहीं मिलता।

मन्दिर में बनने वाले प्रसाद का रहस्य-
मन्दिर में 2000 से 20000 तक श्रद्धालु रोज़ आते हैं। हिन्दू धर्म में अन्न को देवता माना जाता है शायद इसीलिए श्री जगन्नाथ की कृपा से यहाँ पर जो भी प्रसाद बनता है न तो कम पड़ता है और रात में मंदिर के पट्ट बन्द होने से पहले सारा का सारा प्रसाद समाप्त हो जाता है, एक दाना भी नहीं बचता है।

यहाँ प्रसाद 7 मिटटी के बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर लकड़ी की आग पर पकाया जाता है। इनमे सबसे पहले सबसे ऊपर वाले बर्तन का प्रसाद पकता है फिर उसके नीचे वाले बर्तन का और फिर उसके नीचे वाले बर्तन का तथा सबसे नीचे वाले बर्तन का प्रसाद सबसे बाद में, जबकि लकड़ी की आँच सबसे ज्यादा, सबसे नीचे वाले बर्तन को लगती है। इसको चमत्कार ही कहा जा सकता है।

समुद्र की ध्वनि सुनाई नहीं देती-
मन्दिर के मुख्य द्वार (सिंहद्वार) से एक कदम भीतर रखते ही कानो में समुद्र की ध्वनि सुनाई देना बन्द हो जाती है और वापस बाहर आते ही पुनः सुनाई देने लगती है। इसका कोई वैज्ञानिक कारण तो स्पष्ट नहीं हो पाया है परन्तु एक किंवदंती है की दोनों देवो की बहन देवी सुभद्रा ने यहाँ पर शांति की कामना की थी इसीलिए इसे इस तरीके से बनाया गया की समुद्र का शोर भी भीतर जाने पर सुनाई ना दे।

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