भगवान दत्तात्रेय से जुड़ी कुछ खास बातें।

Bhagwan Dattatraye


हिन्दू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों का एक रूप माना गया है। धर्मग्रंथों (पुराणों) के अनुसार भगवान दत्तात्रेय विष्णु के छठे अवतार कहे जाते हैं। वह सर्वव्यापी कहलाये क्योंकि वह आजन्म ब्रह्मचारी  और एक सन्यासी रहे थे। इसी कारण से तीनों ईश्वरीय शक्ति के रूप भगवान दत्तात्रेय की आराधना बहुत सफल, सुखदायी और तुरंत फलदायी मानी जाती है। मन, कर्म और वाणी से की गयी इनकी उपासना भक्त को हर तरह की कठिनाइयों से मुक्ति दिलाती है।

ऐसा कहा जाता है कि भगवान भोले (शिव) का साक्षात् रूप दत्तात्रेय में मिलता है। जब वैदिक कर्मों का, धर्म का और वर्ण व्यवस्था का लोप हो गया था, तब भगवान दत्तात्रेय ने सबका पुनरुद्धार किया था। कृतवीर्य के बड़े पुत्र अर्जुन ने अपनी सेवाओं से इन्हें प्रसन्न कर चार वर प्राप्त किये थे।

पहला: बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, आदोषदर्शी तथा सहभुजाओं वाला बनने का।
दूसरा: जरायुज और अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का।
तीसरा: देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का।
चौथा: इहलोक (पृथ्वीलोक), स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का।

एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पतिव्रत्य पर अत्यंत घमंड हो गया था, तब भगवान ने इनका घमंड ख़त्म करने के लिए लीला रची। इस अनुसार नारद जी एक दिन घुमते-घुमते पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसुइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं है।

तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बतायी और इच्छा जाहिर की कि वे जाकर अनुसुइया के सतीत्व की परीक्षा लें। तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों साधु के वेश में ऋषि अत्रि के आश्रम में पहुंचे। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने अनुसुइया से भिक्षा मांगी और शर्त रखी कि अनुसुइया निर्वस्त्र होकर भिक्षा दे।

अनुसुइया पहले तो चौंक गयी लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और कहा कि यदि मेरा पतिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छः-छः मास के शिशु बन जाये।

ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु बन गए और रोने लगे। अनुसुइया ने माता बनकर तीनों को दूध पिलाया और फिर पालने में सुलाकर झुलाने लगी। जब तीनों देव वापस नहीं लौटे तो तीनों देवियों को चिंता हुई तभी नारद जी ने आकर उन्हें सारी बात बतायी। तीनों देवियों ने अनुसुइया के पास जाकर क्षमा मांगी तब अनुसईया ने तीनों देवों को पुनः अपने पूर्व रूप में बदल दिया।

प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने अनुसुइया को वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा, शिव के अंश से ऋषि दुर्वाशा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ। कुछ पुरानी मान्यताओं के अनुसार भगवान दत्तात्रेय को तीनों देवताओं के अंश रूप में भी माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय गंगा स्नान के लिए आये थे इसलिए गंगा तट पर दत्त पादुका की पूजा की  जाती है। भगवान दत्तात्रेय की पूजा महाराष्ट्र में बड़ी धूमधाम से की जाती है। इन्हें यहाँ गुरु रूप में पूजा जाता है।

भगवान दत्तात्रेय के कुल 24 गुरु माने जाते हैं जिनसे उन्होंने ज्ञानार्जन किया था जो निम्न प्रकार हैं -
पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, समुद्र, अजगर, कपोत, पतंगा, मछली, हिरन, हाथी, मधुमक्खी, शहद निकालने वाला, कुरर पक्षी, कुमारी कन्या, सर्प, बालक, पिंगला वैश्या, बाण बनाने वाला, मकड़ी, भृंगी कीट।

भगवान दत्तात्रेय ने सर्वप्रथम अपनी आत्मा को अपना गुरु बताया है और उसके बाद उन्होंने उपरोक्त सभी 24 को अपना गुरु माना हैं क्योंकि इन सभी से उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था।

अगर आप ये जानना चाहते हैं कि किस प्रकार उपरोक्त गुरुजनों से भगवान दत्तात्रेय ने ज्ञान प्राप्त किया था तो कृपया कमेंट करें हम आपको इस बारे में जरूर बताएँगे।

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