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Showing posts from September, 2019

प्राचीन हिन्दू रीतिरिवाज़ों के पीछे का विज्ञान

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संपूर्ण ब्रह्माण्ड कुछ विज्ञान के नियमों के अनुसार चलता है। आज हम मानवों के साथ यही समस्या है। हमारे दुःख प्रकृति के द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक कानूनों का पालन करने में हमारी असमर्थता के कारण हैं।
हिन्दू धर्म दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म है जो पूरी तरह से प्रकृति के वैज्ञानिक नियमों पर आधारित है, इसी कारण विज्ञान और धर्म के बीच कभी कोई विवाद नहीं था। हालाँकि हमें इस बात की गलत समझ है कि हिन्दुवाद अवैज्ञानिक और अन्धविश्वास से परिपूर्ण है। यह अनुचित विचार हिन्दुओं में पश्चिम से आये लोगों के द्वारा डाला गया था क्योंकि वे एक ऐसे धर्म को समझने की कोशिश में थे जो उन्हें भगवान, प्रकृति और मानव के बारे में उनकी मानक धारणाओं से बिलकुल अलग लगा था। प्राचीन भारत के ऋषिओं को पता था कि भगवान, प्रकृति और मानव तीनों में कही भी कोई पृथकता(अलग) है ही नहीं, जैसा कि यहूदियों में माना जाता था। सनातम धर्म के नाम से जाना जाने वाला आज का हिन्दू धर्म जिसे ऋषिओं ने हमें दिया था, पूरी तरह से वैज्ञानिक मान्यताओं पर आधारित है।
हमारे ऋषि धर्म का प्रचार नहीं करते थे बल्कि जीवन जीने के एक ऐसे तरीके का प्रचार करते थे …

आखिर क्यों मनाये जाते हैं श्राद्ध? - Importance of Shraddh

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श्राद्ध पक्ष का हिन्दू धर्म में बड़ा महत्व है। प्राचीन सनातन धर्म के अनुसार हमारे पूर्वज देवतुल्य हैं और इस धरा पर हमने उन्हीं के द्वारा जीवन प्राप्त किया है तथा जिस प्रकार उन्होंने हमारा लालन-पालन कर हमें कृतार्थ किया है, उससे हम उनके ऋणी हैं। समर्पण और कृतज्ञता की इसी भावना से श्राद्ध पक्ष प्रेरित है, जो जातक को पितर ऋण से मुक्ति मार्ग दिखाता है।

गरूड़ पुराण के अनुसार, समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।’

महाभारत के अनुसार, सबसे पहले महातप्सवी अत्रि ने महर्षि निमि को श्राद्ध के बारे में उपदेश दिया था। इसके बाद महर्षि निमि ने श्राद्ध करना शुरू कर दिया। महर्षि को देखकर अन्य श्रृषि-मुनि भी पितरों को अन्न देने लगे।
लगातार श्राद्ध का भोजन करते-करते देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गए।

'श्राद्ध' शब्द 'श्रद्धा' से बना है, जो श्राद्ध का प्रथम अनिवा…

आखिर क्यों प्रभु श्रीकृष्ण को "56" भोग लगाया जाता है?

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जैसा कि आप सभी जानते हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण (Krishna) को "56" भोग का भोग लगाया जाता है परन्तु ऐसा होने के पीछे क्या कारण है? आखिर "56" भोग की इस परंपरा की शुरुआत कहाँ से हुई ?

त्रेतायुग के समय की बात है। स्वर्ग के अधिपति राजा इंद्र जो कि सभी देवताओं के राजा भी माने जाते हैं। मनुष्य तथा देवताओं के पुजनीय है। सभी के द्वारा इंद्र की पूजा बड़े धूमधाम से की जाती थी। क्योंकि लोगों का मानना था कि इंद्र ही सबसे बड़े देवता हैं और यदि इंद्र क्रोधित हुए तो धरती पर अल्पवृष्टि या अतिवृष्टि हो जायेगी। इसी डर के कारण सभी मनुष्य इंद्र से बहुत डरते थे और उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उनकी पूजा बड़े धूमधाम से की जाती थी। मनुष्यों के डर को इंद्र अपना सम्मान समझता था।

एक बार दीपावली के अगले दिन सभी वृन्दावनवासी इंद्र की पूजा की तैयारियों में व्यस्त थे। प्रभु श्रीकृष्ण (krishna) अपनी गैयाओं के साथ जंगल की और प्रस्थान कर रहे थे कि तभी यशोदा मैयां ने उन्हें कहा लाला पहले इंद्र की पूजा कर लो उसके बाद गइया चराने जाना प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी मैयां से पूछा कि मैयां हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं…

कैसे हुई गणेश पुराण की शुरुआत?

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गणेश पुराण भगवान् श्री गजानन के अनंत चरित्र को दर्शाता है। इसको सुनाने और सुनने वाले सभी का कल्याण होता है और श्री गणेश की कृपा बनी रहती है। श्री गणेश प्रथम पूज्य तो हैं ही, साथ ही विघ्नेश्वर भी कहे जाते हैं क्योंकि श्री गणेश अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर कर देते हैं। गणेश पुराण श्री गणेश जी की महिमाओं से जुड़ी बहुत सी बातें बताता है।
गणेश पुराण की उत्पत्ति के बारे में जानने से पहले महर्षि भृगु द्वारा राजा सोमकान्त को गणेश पुराण सुनाये जाने के बारे में जानना चाहिए।
राजा सोमकान्त सौराष्ट्र की राजधानी देवनगर के राजा था। वह वेदों, शस्त्र-विद्या आदि के ज्ञान से संपन्न था। उसने अपने पराक्रम के बल पर अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी। उसने अपनी प्रजा का पालन पुत्र की भांति किया था। उसकी पत्नी सुधर्मा पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली अति सूंदर तथा गुणवती स्त्री थी। राजा भी पत्नीव्रत धर्म का पालन करने वाला अति उत्तम पुरुष था।
जितना उत्तम राजा था उतना ही उत्तम उसका पुत्र था, जो सभी तरह की विद्याओं में निपुण और प्रजा के भले की सोचने वाला था। राजा का जीवन पूर्ण सुखी और सम्माननीय था। परन्तु युवावस्था …