कैसे हुई गणेश पुराण की शुरुआत?

कैसे हुई गणेश पुराण की शुरुआत?


गणेश पुराण भगवान् श्री गजानन के अनंत चरित्र को दर्शाता है। इसको सुनाने और सुनने वाले सभी का कल्याण होता है और श्री गणेश की कृपा बनी रहती है। श्री गणेश प्रथम पूज्य तो हैं ही, साथ ही विघ्नेश्वर भी कहे जाते हैं क्योंकि श्री गणेश अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर कर देते हैं। गणेश पुराण श्री गणेश जी की महिमाओं से जुड़ी बहुत सी बातें बताता है।

गणेश पुराण की उत्पत्ति के बारे में जानने से पहले महर्षि भृगु द्वारा राजा सोमकान्त को गणेश पुराण सुनाये जाने के बारे में जानना चाहिए।

राजा सोमकान्त सौराष्ट्र की राजधानी देवनगर के राजा था। वह वेदों, शस्त्र-विद्या आदि के ज्ञान से संपन्न था। उसने अपने पराक्रम के बल पर अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी। उसने अपनी प्रजा का पालन पुत्र की भांति किया था। उसकी पत्नी सुधर्मा पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली अति सूंदर तथा गुणवती स्त्री थी। राजा भी पत्नीव्रत धर्म का पालन करने वाला अति उत्तम पुरुष था।

जितना उत्तम राजा था उतना ही उत्तम उसका पुत्र था, जो सभी तरह की विद्याओं में निपुण और प्रजा के भले की सोचने वाला था। राजा का जीवन पूर्ण सुखी और सम्माननीय था। परन्तु युवावस्था के अंत में राजा को कुष्ठ रोग हो गया था। बहुत उपचार करवाने पर भी कोई फायदा नहीं हुआ तो राजा निराश हो गया और राजपाट छोड़कर वन में जाने की ठान ली। अपने मंत्रियों से पुत्र को राज्य चलने में मदद करने को कहकर राजा ने शुभ मुहूर्त देखकर पुत्र का राज्याभिषेक किया और फिर वन के लिए चल पड़ा। सोमकान्त के पीछे उसका पुत्र, सभी मंत्रीगण और प्रजाजन भी चल दिये। जिन्हें राजा ने राज्य की सीमा पर पहुंचकर समझाकर वापस लौटाया। पुत्र के कहने पर राजा ने 2 सेवक अपने साथ में ले लिये।

वन में पहुंचकर राजा, उसकी पत्नी और सेवक एक साफ़ और समतल जगह देखकर विश्राम के लिए रुके, जहाँ पर उन्हें महर्षि भृगु का पुत्र च्यवन मिला। च्यवन से परिचय के पश्चात् च्यवन ने राजा के रोग की बात महर्षि भृगु से जाकर कही। महर्षि के कहने पर च्यवन राजा, उसकी पत्नी और सेवकों को आश्रम ले गया। जहाँ उन्होंने स्नानादि करके भोजन कर रात्रि विश्राम किया। अगले दिन सुबह उठकर नित्यकर्मों से निवृत होकर राजा महर्षि भृगु के सामने उपस्थित हुआ।

महर्षि भृगु ने राजा को उसके रोग का कारण उसके पूर्वजन्म के पाप बताये। जब राजा ने पूर्वजन्म के पाप के बारे में जानना की इच्छा जताई तो श्री भृगु ने उन्हें पूर्वजन्म में की गयी निर्दोषों की हत्याओं, लूटपाट आदि के बारे में बताया। महर्षि ने उन्हें यह भी बताया कि कैसे जीवन के अंतिम समय में राजा सोमकान्त ने भगवान श्री गणेश्वर के खंडहर हो चुके मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया जिसके कारण राजा को पुण्य की प्राप्ति हुई। पूर्वजन्म में मृत्यु के बाद जब राजा को यमदूतों ने यमराज के सामने पेश किया तब यमराज के ये पूछने पर कि राजा पाप और पुण्य में से किसे पहले भोगना चाहता है, राजा ने पुण्य भोगने की बात कही थी। इसी कारण इस जन्म में अब तक राजा बनकर सोमकान्त उसी पुण्य को भोग रहा था परन्तु अब पुण्य का समय ख़त्म हो गया था और पाप भोगने का समय शुरू हो चूका था इसलिए सोमकान्त कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गया था।

राजा सोमकान्त के रोग से मुक्त होने का उपाय पूछने पर महर्षि ने उन्हें गणेश पुराण सुनने के लिए कहा। परन्तु राजा ने तो कभी गणेश पुराण के बारे में कुछ भी नहीं सुना था इसलिए राजा ने महर्षि भृगु से निवेदन किया कि महर्षि से ज्यादा ज्ञानी और उत्तम कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हो सकता जो कि गणेश पुराण सुना सके, अतः स्वयं महर्षि ही राजा को गणेश पुराण सुना दें। महर्षि ने राजा की बात मान ली और राजा पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे राजा को एक छींक आयी और उसकी नाक से एक काला और अजीब सा दिखने वाला पुरुष बहार निकला जो बड़ा होता गया और उसे देखकर सभी डर गये।

यह पुरुष पाप था और महर्षि के द्वारा राजा पर डाले गये जल के कारण राजा के शरीर से बहार आ गया था। महर्षि के कहने पर पाप अपनी भूख शांत करने के लिए निकट स्थित एक आम के पेड़ के पास गया और जैसे ही आम खाने के लिए पेड़ को छुआ तो पूरा पेड़ जलकर भस्म हो गया। इसके घटना के बाद पाप गायब हो गया। राजा को अपने रोग में आराम मिल गया था। महर्षि ने आम के पेड़ के वापस पहले जैसा न होने तक गणेश पुराण सुनाने की बात कही।

राजा के मन में प्रश्न उठा कि आखिर गणेश पुराण की रचना किसने की, और उन्होंने महर्षि से यह पूछा। महर्षि भृगु ने तब राजा को बताना शुरू किया।

"महर्षि वेदव्यास जी ने जब वेदों में लिखी सभी बातों को चार अलग-अलग वेदों में आसान भाषा में बदल दिया तब सभी विद्वानों में उनकी बड़ी तारीफ हुई। इस बात से वेदव्यास जी को स्वयं पर गर्व हो गया। उसी गर्व के चलते अब वह पुराणों की रचना करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पुराणों की रचना शुरू की। परन्तु अपने अभिमान के चलते उन्होंने भगवान श्री गणेश की आराधना किये बिना ही पुराणों की रचना शुरू कर दी और गणेश जी को आराधना तो हर शुभ कार्य के पहले अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए थी क्योंकि वे तो प्रथम पूज्य हैं। वेदव्यास जी से हुई इस गलती का दंड तो उन्हें मिलना ही था। पुराणों की रचना करते समय वेदव्यास जी बहुत सी महत्वपूर्ण बातों के विषय में भूलने लगे, और इससे पुराणों की रचना में विघ्न होने लगा। वेदव्यास जी काफी निराश हुए और उन्होंने भगवान ब्रह्मा जी से इसके हेतु मिलना तय किया और वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। उन्होंने सारी बात ब्रह्मा जी को बताई। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि भगवान श्री गणेश किसी को भी अभिमानी नहीं रहने देते हैं, वे तो सर्वज्ञ हैं। वेदव्यास जी को अपनी भूल का आभास हो गया था और वे इसका पश्चाताप करने का उपाय जानने के इच्छुक हुए, तब ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान श्री गणेश की पूजा करने के लिए कहा और उन्हें पूर्ण पूजा विधि के बारे में बताया।

पूजा विधि जानने के बाद वेदव्यास जी गणेश जी के बारे में और ज्यादा जानने को उत्सुक हुए तब भगवान ब्रह्मा जी ने उन्हें श्री गणेश जी की महिमाओं के बारे में कई कथाएं कही, उन्हीं सब गणपति महिमाओं को संकलित कर महर्षि वेदव्यास जी ने गणेश पुराण की रचना की थी।

Comments

Popular Posts

महाभारत के युद्ध में भोजन प्रबंधन |

मृत्यु से भय कैसा ?

कुसङ्ग से हानि एवं सुसङ्ग से लाभ