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Showing posts from November, 2019

दर्शन के बाद मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने की परम्परा क्यों हैं।

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हमारे समाज में बहुत से ऐसे रीती-रिवाज़ है जिन्हे हम सभी ने अपने जीवन में देखा है, ऐसा ही एक रिवाज़ है मंदिर से निकलते समय मदिर की पेड़ी या सीढ़ी पर बैठना । आइये जानते है की इसके पीछे क्या कारन है।
आपने बड़े बुजुर्ग को कहते और करते देखा होगा कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाते है तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं ।
आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई थी। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं । आप इस श्लोक को पढ़े और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताए । यह श्लोक इस प्रकार है -
अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम् ।।
इस श्लोक का अर्थ है "अनायासेन मरणम्" अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर ना पड़े, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाए ।
"बिना देन्येन जीवनम्" अर्थात…

देवउठनी एकादशी 2019 : तुलसी, गंडकी नदी और शालिग्राम की पौराणिक कथा

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शिव महापुराण के अनुसार पौराणिक समय में दैत्यों के वंश में दंभ नाम का एक राजा हुआ। वह बहुत बड़ा विष्णु भक्त था। कई सालों तक उसके यहां संतान नही होने के कारण उसने दैत्य गुरु शुक्राचार्य को अपना गुरु बनाकर उनसे श्री कृष्ण मन्त्र प्राप्त किया। मन्त्र प्राप्त करके उसने पुष्कर सरोवर में घोर तपस्या की। भगवान विष्णु उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे संतान प्राप्ति का वरदान दे दिया।
भगवान विष्णु के वरदान से राजा दंभ के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया। इस पुत्र का नाम शंखचूड़ रखा गया। शंखचूड़ ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए पुष्कर में घोर तपस्या की।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब शंखचूड़ ने वरदान मांगा कि वह हमेशा अजर-अमर रहे व कोई भी देवता उसे कोई हानि ना पहुँचा पाए। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया और कहा कि वह बदरीवन जाकर धर्मध्वज की पुत्री तुलसी जो तपस्या कर रही है उससे विवाह कर लें। शंखचूड़ ने वैसा ही किया और तुलसी के साथ विवाह के बाद सुखपूर्वक रहने लगा।
उसने अपने बल से देवताओं, असुरों, दानवों, राक्षसों, गंधर्वों, नागों, किन्नरों, मनुष्यों तथा त्रिलोक…