शमशान में महिलायें क्यों नहीं जाती हैं।

शमशान में महिलायें क्यों नहीं जाती हैं।


आप सभी ने देखा होगा की कभी भी महिलायें अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होती और ना ही शमशान जाती हैं। इसके पीछे के कारणों का क्या आपने कभी विचार किया की ऐसा क्यों होता है। आइये जानते हैं की आखिर क्यों महिलायें अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होती और ना ही शमशान में प्रवेश करती है।

ऐसा नहीं हैं की महिलाओं को शमशान में जाने नहीं दिया जाता, पहले के समय में महिलायें शमशान जाया करती थी परन्तु इतिहास में एक समय ऐसा आया जब ब्रह्माजी के द्वारा महिलाओं का शमशान में जाने पर पाबंदी लगा दी गयी।

बात तब की हैं जब हिंदुस्तान पर राज्य राजा हरिश्चंद्र का था। उनके राज्य में किसी प्रकार की हिंसा या चोरी-चकारी नहीं होती थी। एक बार स्वर्ग में बहस छिड़ गयी की इस युग में कोई भी ऐसा नहीं है जो सत्य के मार्ग पर चलता हो, उसी समय ऋषि विश्वामित्र ने कहा की ऐसा नहीं है। आज भी एक इंसान ऐसा है जिसका जीवन सत्य पर आधारित है, उनका नाम है राजा हरिश्चंद्र। इस बात को मानने से देवताओं ने इंकार कर दिया और परीक्षा का प्रमाण देने को कहा।

इस बात को सत्य साबित करने के लिए ऋषि विश्वामित्र ने कहा की मैं खुद परीक्षा लूँगा और उसी समय वे राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने के लिए धरती पर आये और एक ब्राह्मण का रूप लिया तथा अपनी शक्ति से एक बालक और बालिका का सृजन किया। राजा हरिश्चंद्र उसी मार्ग से निकले जिधर ऋषि ब्राह्मण का रूप धारण करके परीक्षा लेने के लिए तैयार खड़े थे। राजा को आता देख ब्राह्मण अपने पुत्र-पुत्री को पीटने लगा, जिसका कारण राजा ने जानना चाहा तो ब्राह्मण रूपी ऋषि ने कहा की उसके पास धन नहीं है इसलिए वो अपने बच्चो के विवाह और जीवनयापन में सक्षम नहीं है।

राजा ने कारण जानकर कहा की आप चिंता ना करे मैं आपकी साहयता करूँगा, आप जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा। ब्राह्मण ने कहा की पुत्री की शादी करनी है और पुत्र के जीवनयापन की व्यवस्था करनी है। राजा ने अपने मंत्री को आज्ञा दी की शीघ्र अति शीघ्र बालिका के विवाह की तैयारी की जाये, राजा के द्वारा किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं रखी गयी। विवाह के पश्चात राजा ने ब्राह्मण से कहा की आप मेरे दरबार में पधारे और आज्ञा करे की आप अपने पुत्र के लिए क्या व्यवस्था चाहते हैं। कुछ समय के पश्चात ब्राह्मण पुत्र के साथ राजा के दरबार में पहुँच गए। राजा ने ब्राह्मण की मन की बात जाननी चाही तो ब्राह्मण ने कहा की आपका पूर्ण राज्य और 1,00,000 स्वर्ण मुद्राएं मुझे चाहिये अपने पुत्र के लिये, ऐसा सुनते ही राजा ने बिना कुछ सोचे-विचारे राज्य ब्राह्मण को दे दिया और स्वर्ण मुद्राये चुकाने के लिये एक माह की अवधि माँगी। ब्राह्मण को वचन देने के बाद राजा ने कशी का रुख किया। वहाँ पहुँच कर राजा ने बहुत कोशिश की पर सब व्यर्थ रहा और ब्राह्मण के द्वारा दी गयी अवधि भी समाप्त हो गयी। जिस दिन अवधि समाप्त होने वाली थी उसी समय राजा ने अपने आपको और अपने परिवार (पुत्र और पत्नी) को बेचने का फैसला किया। राजा और उसके परिवार को खरीदने के लिये धर्मराज "कात्या ब्राह्मण" का रूप धारण कर प्रकट हुए।

सर्वप्रथम राजा ने अपनी पत्नी को एक ऋषि के हाथों बेच दिया, ऋषि ने राजा की पत्नी को दासी के रूप में स्वीकार किया परन्तु पुत्र को साथ ले जाने से मना कर दिया परन्तु दासी के बार बार आग्रह करने पर राजा के पुत्र को भी साथ ले लिया। ये ऋषि कोई और नहीं स्वयं विश्वामित्र थे।

राजा को "कात्या ब्राह्मण" ने खरीद लिया और शर्त रखी की तुझे जीवनयापन के लिये शमशान में शवों को जलाने का कार्य करना होगा और जो भोग कौवे को कराया जाता है उसी में से जो बच जाये उसे पाना होगा, तथा बिना शुल्क के तुझे किसी का दाह-संस्कार करने की इजाजत नहीं है। राजा ने सभी बाते मानी और धर्मराज के साथ चल पड़े।

इस प्रकार राजा ने अपने और अपने परिवार को बेच कर प्राप्त की गयी 1,00,000 मुद्राएं ब्राह्मण को देकर अपने वचन का पालन किया। कुछ समय बाद राजा के पुत्र का निधन हो गया। राजा की पत्नी पुत्र को लेकर शमशान पहुँची, राजा ने अपनी पत्नी को देखे बिना उनसे शव के अंतिम-संस्कार का शुल्क माँगा जिसे देने में रानी ने असमर्थता जताई तथा राजा को अपना परिचय दिया और सारी व्यथा सुनाई।

रानी के अश्रु देख कर राजा से ये सब सहन नहीं हुआ और इस सारी स्थिति का कारण अपने आप को मानकर अपने जीवन को समाप्त कर देने के लिये तलवार निकाल ली और जैसे ही राजा तलवार को चलाने को तैयार हुए, उसी समय सभी देवी देवताओं समेत त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) वहाँ उपस्थित हुए और राजा के धर्म-परायण होने के कारण उनकी की जय जयकार करने लगे। तथा सारी परिस्थिति से राजा को अवगत कराया और राजा के पुत्र को भी पुनः जीवित किया।

रानी के कोमल हृदय और अश्रुओं को देखकर ब्रह्माजी ने सभी से कहा की आज से नारी जाती का शमशान में प्रवेश वर्जित होगा क्योंकि नारी कोमल हृदय की स्वामिनी होती है जो अपने प्रियजनो को अपने सामने जलता हुआ नहीं देख सकती। नारी के अश्रुओं के कारण पुरुष भी भावना में बह जाता है और अपने धर्म से भटक जाता है, पुरुष अपने धर्म से ना भटके तथा अंतिम-संस्कार की विधि को बिना किसी व्यवधान के पूर्ण कर सके इसीलिए नारी जाती का अंतिम-यात्रा और शमशान में प्रवेश वर्जित किया जाता है, तभी से नारी जाती का शमशान में प्रवेश वर्जित है। 

Comments

Popular Posts

मृत्यु से भय कैसा ?

आखिर किसने पिया पूरे "समुद्र" को ?

जानिए क्यों आती है कैलाश पर्वत से ॐ की आवाज ? Kailash Parvat | Kailash Mansarovar ke rehsya