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Showing posts from May, 2020

गंगाजल खराब क्यों नहीं होता।

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हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा (भागीरथी), हरिद्वार (देवप्रयाग) में अलकनंदा से मिलती है। यहाँ तक आते-आते इसमें कुछ चट्टानें घुलती जाती हैं जिससे इसके जल में ऐसी क्षमता पैदा हो जाती है जो पानी को सड़ने नहीं देती। हर नदी के जल की अपनी जैविक संरचना होती है, जिसमें वह ख़ास तरह के घुले हुए पदार्थ रहते हैं जो कुछ क़िस्म के जीवाणु को पनपने देते हैं और कुछ को नहीं। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि गंगा के पानी में ऐसे जीवाणु हैं जो सड़ाने वाले कीटाणुओं को पनपने नहीं देते, इसलिए पानी लंबे समय तक ख़राब नहीं होता।
वैज्ञानिक कारण
वैज्ञानिक बताते हैं कि हरिद्वार में गोमुख- गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता पर इसलिए कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवनदायनी उपयोगी जड़ी-बूटियों, खनिज पदार्थों और लवणों को स्पर्श करता हुआ आता है। वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा के जल का ख़राब नहीं होने के कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। गंगाजल में बैट्रिया फोस नामक एक बैक्टीरिया पाया गया है जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले…

असीम रहस्यों वाला मंदिर जगन्नाथ पूरी

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हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यतओं में चारो धामों को एक युग का प्रतिक माना जाता है। भगवान् जगन्नाथ पूरी मंदिर के बारे में जानकारी सनातन धर्म के सभी ग्रंथो में मिलता है। इस तरह कलयुग का पवित्र धाम जगन्नाथ पूरी को माना गया है। एक ऐसा धाम जहाँ आषाढ़ के महीने में दुनियाभर से लाखों श्रद्धालु उमड़ते है। हर साल होने वाली भगवान् जगन्नाथ की रथ यात्रा में लाखों लोग शामिल होते है और भगवान् जगन्नाथ के साथ साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का रथ भी खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते है। भगवान् जगन्नाथ धाम की ऐसी परम्परा जो पिछले पांच सौ सालो में भी फीकी नहीं हुई। पूरी दुनिया में जहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण का मंदिर होता है वहाँ श्रीकृष्ण के साथ श्रीराधा की ही मूर्ति मिलती है परन्तु जगन्नाथ पूरी में श्रीकृष्ण के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्ति मिलती है। इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है कहते है एक बार श्रीकृष्ण में स्वप्न में राधा का नाम लिया यह नाम सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण की पत्नी रुकमणीजी हैरान रह गयी और उन्होंने राधा की पूरी कहानी पता लगाने की ठानी। कथा कहती है की वो रोहिणीजी थी जिन्होंने रुकमणीजी …

क्या आप जानते है की दुनिया का सबसे रहस्य्मयी मंदिर कौन सा है।

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एलोरा गुफाओं में मौजूद कैलाश मंदिर, बारह सौ वर्ष पहले ज्वलामुखी चट्टानों से काट कर बनाया गया है। सबसे दिलचस्प बात है की जब कभी कोई निर्माण किया जाता है तो नीचे से शुरू करके ऊपर की तरफ बनाया जाता है, किन्तु एलोरा गुफाओं में मौजूद कैलाश मंदिर को ऊपर से चट्टानों की कटाई करके रूप देना शुरू किया गया और फिर धीरे धीरे नीचे उतरते हुए इसे मंदिर का रूप दिया गया।
निर्माण की इस प्रक्रिया का अंदाजा इसे देखे बिना नहीं लगाया जा सकता। एलोरा यानी स्थानीय भाषा में वेरुल, महाराष्ट्र के औरंगाबाद में है। यहाँ दो किलोमीटर के इलाके में सौ से ज्यादा गुफाएं है। लेकिन उनमे से केवल 34 गुफाएं ही देखि जा सकती है। लगभग 6 करोड़ 60 लाख वर्ष पूर्व ज्वालामुखी की हलचल से यहाँ विभिन्न सतहों की हरी और भूरी रंग की चट्टाने बन गयी थी जिन्हे डेक्कन ट्रेप के नाम से भी जाना जाता है। 
एलोरा दुनिया के सबसे बड़े गुफा परिसरों में से एक है। यहाँ 600 सी. ई. से लेकर 1000 सी. ई. तक के जैन, बौद्ध और हिन्दू स्मारक और कलाकारी के नमूने मौजूद है। इन्हे राजाओं और व्यापारियों ने खोजा था। एलोरा का गुफा परिसर इसी इलाके में इसलिए बनाया गया क्योंकि …

क्यों करते है वटवृक्ष की पूजा

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वाल्मीकि रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का सन्दर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान् राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुँचे। वहाँ श्राद्ध के लिए आवश्यक वस्तू जुटाने के लिए राम और लक्ष्मण नगर की और चल दिए। उधर दोपहर तक भी राम और लक्ष्मण के नगर से ना लौटने पर, पिंडदान का समय निकला जा रहा था, तथा सीता जी की व्याग्रता बढ़ती जा रही थी।
तभी दशरथजी की दिवंगत आत्मा ने पिंडदान में हो रही देरी के कारण सीताजी से ही पिंडदान करने की बात कही। गयाजी से कुछ ही दूर फाल्गुन नदी पर अकेली सीताजी असमंजस में पड़ गयी। सीताजी ने फाल्गुन नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित पिंडदान कर दिया। कुछ समय के बाद भगवान् राम और लक्ष्मण लौटे तो सीताजी ने उनसे कहा की समय विलम्ब होने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया है बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है। इसलिए भगवान् राम ने सीताजी से प्रमाण माँगा।
तब सीताजी ने कहा की ये फाल्गुन नदी, केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष साक्षी है की मैंने पिंड…