क्यों करते है वटवृक्ष की पूजा

क्यों करते है वटवृक्ष की पूजा

वाल्मीकि रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का सन्दर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान् राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुँचे। वहाँ श्राद्ध के लिए आवश्यक वस्तू जुटाने के लिए राम और लक्ष्मण नगर की और चल दिए। उधर दोपहर तक भी राम और लक्ष्मण के नगर से ना लौटने पर, पिंडदान का समय निकला जा रहा था, तथा सीता जी की व्याग्रता बढ़ती जा रही थी।

तभी दशरथजी की दिवंगत आत्मा ने पिंडदान में हो रही देरी के कारण सीताजी से ही पिंडदान करने की बात कही। गयाजी से कुछ ही दूर फाल्गुन नदी पर अकेली सीताजी असमंजस में पड़ गयी। सीताजी ने फाल्गुन नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित पिंडदान कर दिया। कुछ समय के बाद भगवान् राम और लक्ष्मण लौटे तो सीताजी ने उनसे कहा की समय विलम्ब होने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया है बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है। इसलिए भगवान् राम ने सीताजी से प्रमाण माँगा।

तब सीताजी ने कहा की ये फाल्गुन नदी, केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष साक्षी है की मैंने पिंडदान कर दिया है। परन्तु सीताजी की इस बात से फाल्गुन नदी, केतकी के फूल और गाय मुकर गए और इस बारे में कोई भी जानकारी ना होना स्वीकारा। सिर्फ वटवृक्ष ने सीताजी की बात की पुष्टि की, ऐसी स्थिति में सीताजी ने दशरथजी का ध्यान कर इस बात की गवाही देने की प्रार्थना की। दशरथजी ने सीताजी की प्रार्थना स्वीकार की और घोषणा कि, की समय में विलम्ब होने के कारण सीताजी ने ही पिंडदान किया है। दशरथजी के गवाही देने पर भगवान् श्रीराम ने सीताजी की बात का विश्वास किया।

सीताजी ने तीनो गवाहों पर क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया की, फाल्गुन नदी तू सिर्फ नाम की ही नदी रहेगी, तुझ में कभी पानी नहीं रहेगा तब से फाल्गुन नदी सुखी ही रहती है। सीताजी ने गाय को श्राप दिया की तू पूज्य होकर भी लोगो का झूठा ही खायेगी तथा केतकी के फूल को श्राप दिया की तुझे कभी भी भगवान् की पूजा में चढ़ाया नहीं जाएगा। उसके बाद वटवृक्ष को सीताजी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ की तुझे लम्बी आयु प्राप्त होगी और तेरे विशालतम स्वरुप के कारण तू निर्जन वन में भी हराभरा रहेगा, "स्त्रियाँ तेरी पूजा करके अपने पति की लम्बी आयु की प्रार्थना करेंगी" तथा तुझ पर सदैव पक्षियों का बसेरा रहेगा और तेरी छाव में बैठ मुसाफिर आराम पायेंगे।

सीताजी के श्राप के कारण ही गाय को पूज्यनीय स्थान प्राप्त होने के बाद भी लोगो का झूठा खाना पड़ता है, केतकी के सुन्दर फूल को किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ में वर्जित माना गया है और गयाजी के पास फाल्गुन नदी में सीताकुंड पे बालू की रेत से बिना पानी के ही पिंडदान दिया जाता है।

आप सभी को हम ये बताना चाहते है की हमारे सनातन धर्म में हर एक क्रिया और पूजा के पीछे एक तार्तिक कारण छुपा है, स्पिरिचुअल गॉसिप्स के इस प्लेटफार्म के द्वारा हमारी यही कोशिश रहती है की हम ऐसे रीती-रिवाजो के पीछे का कारण ढूँढ कर आप तक ला सके।

Comments

Popular Posts

महाभारत के युद्ध में भोजन प्रबंधन |

मृत्यु से भय कैसा ?

कलयुग का अंत आते आते कैसी हरकते करने लगेंगे लोग ?