तुलसी का महत्त्व और इससे जुड़े रोचक तथ्य

तुलसी का महत्त्व और इससे जुड़े रोचक तथ्य


तुलसी का पौधा हमारे लिए धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व का पौधा है जिस घर में इसका वास होता है वहां  आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ सुख-शांति एवं आर्थिक समृद्धि स्वतः आ जाती है। वातावारण में स्वच्छता एवं शुद्धता, प्रदूषण का शमन, घर परिवार में आरोग्य की जड़ें मज़बूत करने, श्रद्धा तत्व को जीवित करने जैसे इसके अनेकों लाभ  हैं। तुलसी के नियमित सेवन से सौभाग्य के साथ ही सोच में पवित्रता, मन में एकाग्रता आती है और क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। आलस्य दूर होकर शरीर में दिनभर फूर्ती बनी रहती है। तुलसी की सूक्ष्म व कारण शक्ति अद्वितीय है। यह आत्मोन्नति का पथ प्रशस्त करती है तथा गुणों की दृष्टि से संजीवनी बूटी है। तुलसी को प्रत्यक्ष देव मानने और मंदिरों एवं घरों में उसे लगाने, पूजा करने के पीछे संभवतः यही कारण है कि यह सर्व दोष निवारक औषधि सर्व सुलभ तथा सर्वोपयोगी है। धार्मिक धारणा है कि तुलसी की सेवापूजा व आराधना से व्यक्ति स्वस्थ एवं सुखी रहता है। अनेक भारतीय हर रोग में तुलसीदल-ग्रहण करते हुए इसे दैवीय गुणों से युक्त सौ रोगों की एक दवा मानते हैं। गले में तुलसी-काष्ठ की माला पहनते हैं।


सनातन धर्म में जितना महत्त्व तुलसी का बताया गया है उतना किसी का नहीं है। चाहे बात चरणामृत की हो या फिर तुलसी के औषधीय गुणों की सभी बुद्धिमान लोगों का एक ही मत है की तुलसी के बराबर कुछ नहीं। आज के इस वैश्विक दौर में जहाँ जीवन घोर विनाशकारी परिस्थितियों में घिरा हुआ है, इस दौर में भी तुलसी का एक अलग ही महत्व है तुलसी के सेवन से जहाँ अनेकों-अनेक गंभीर बीमारियाँ ठीक होती है, वही बात घर के वातावरण को शुद्ध और दैविक बनाये रखने की हो तो भी तुलसी का कोई मुकाबला नहीं है।

आप सभी मन्दिर जाते है और सभी ने अवश्य ही चरणामृत लिया होगा। चरणामृत को सनातन धर्म में एक विशेष दर्जा प्राप्त है। चरणामृत के पीछे भी विज्ञान है। सभी पुराने मन्दिरों में मूर्तियाँ अष्टधातु की विराजमान की गयी है और चरणामृत में जल सदैव गंगाजल ही उपयोग किया जाता है। गंगाजल चरणामृत तब बनता है जब गंगाजल को ठाकुर जी की अष्टधातु की मूर्ति पर डाला जाता है, गंगाजल ठाकुर जी की मूर्ति के मस्तक से लेकर चरणों तक अष्टधातु के संपर्क में रहता है जिससे अष्टधातु के गुण गंगाजल तथा तुलसी के साथ मिलकर उसे चरणामृत बना देते है। जिन आठ धातुओं से मिलकर अष्टधातु बनती है, वे हैं- सोना, चाँदी, तांबा, सीसा, जस्ता, टिन, लोहा, तथा पारा (रस) है। ना केवल सनातन धर्म में बल्कि विज्ञान भी चरणामृत को औषधि मानता है।

तुलसी चरणामृत लेने का मन्त्र -


अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम।

विष्णु पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विधते।।

तुलसी के तीन प्रकार होते हैं- कृष्ण तुलसी, वन तुलसी तथा राम तुलसी। इनमें कृष्ण तुलसी सर्वप्रिय मानी जाती है। तुलसी में खड़ी मंजरियाँ उगती हैं। इन मंजरियों में छोटे-छोटे फूल होते हैं।


देव और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका, उसी से तुलसी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मदेव ने उसे भगवान विष्णु को सौंपा। भगवान विष्णु, योगेश्वर कृष्ण और पांडुरंग (श्री बालाजी) के पूजन के समय तुलसी पत्रों का हार उनकी प्रतिमाओं को अर्पण किया जाता है।

वन सम्पत्तियाँ तो और भी बहुत है किन्तु तुलसी की तुलना में सब गौंण है। हमारे ऋषियों को इसके निरंतर ऑक्सीज़न देने का ज्ञान था इसलिए ऑक्सीज़न घरों में निरंतर रहे इसी विचार से घरो में तुलसी लगाना, इसकी परिक्रमा करना सनातन धर्म की एक मान्यता  बना दी गई, सायंकाल तुलसी में दीपक प्रज्वलित करना धर्म है

गुरुदीक्षा में शिष्य को तुलसी काष्ठ की कंठी पहनाई जाती है। जप करने हेतु तुलसी की माला सर्वोत्तम है | हनुमान जी की प्रसन्ता हेतु तुलसी पत्र पर राम नाम  लिखकर इन पतों की माला धारण करवाई जाती है। तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम से कराया जाता है। तुलसी के निमित कार्तिक माह में तीन दिन का उपवास रखा जाता है।

दैवीय गुण एवं औषधियों की खान:-


तुलसी को दैवीय गुणों से अभिपूरित मानते हुए इसके विषय में अध्यात्म ग्रंथों में काफ़ी कुछ लिखा गया है। तुलसी औषधियों की खान हैं। इस कारण तुलसी को अथर्ववेद में महाऔषधि की संज्ञा दी गई हैं। इसे संस्कृत में हरिप्रिया कहते हैं। इस औषधि की उत्पत्ति से भगवान् विष्णु का मनः संताप दूर हुआ इसी कारण यह नाम इसे दिया गया है। ऐसा विश्वास है कि तुलसी की जड़ में सभी तीर्थ, मध्य में सभी देव-देवियाँ और ऊपरी शाखाओं में सभी वेद स्थित हैं। तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक समझा जाता है तथा पूजन करना मोक्षदायक। देवपूजा और श्राद्धकर्म में तुलसी आवश्यक है। तुलसी पत्र से पूजा करने से व्रत, यज्ञ, जप, होम, हवन करने का पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा कहा जाता है, जिनके मृत शरीर का दहन तुलसी की लकड़ी की अग्नि से क्रिया जाता है, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। प्राणी के अंत समय में मृत शैया पर पड़े रोगी को तुलसी दलयुक्त जल सेवन कराये जाने के विधान में तुलसी की शुद्धता ही मानी जाती है और उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो, ऐसा माना जाता है।

देवता के रूप में पूजे जाने वाले इस पौधे ‘तुलसी’ की पूजा कब कैसे, क्यों और किसके द्वारा शुरू की गई इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार देव और दानवों द्वारा समुद्र मंथन के समय अमृत की कुछ बुँदे धरती पर छलक गयी, उन्ही बूंदों से ‘‘तुलसी’’ की उत्पत्ति हुई । लंका में विभीषण के घर तुलसी का पौधा देखकर हनुमानजी अति हर्षित हुये थे। इसकी महिमा के वर्णन में कहा गया है,

नामायुध अंकित गृह शोभा वरणी न जाई।

नव तुलसी के वृन्द तहं देखि हरषि कपिराई।।

पद्म पुराण में लिखा है कि जहाँ तुलसी का एक भी पौधा होता है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी निवास करते हैं। आगे वर्णन आता है कि तुलसी की सेवा करने से महापातक भी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होने से अंधकार नष्ट हो जाता है। कहते हैं कि जिस प्रसाद में तुलसी नहीं होती उसे भगवान स्वीकार नहीं करते। तुलसी - वृन्दा श्रीकृष्ण भगवान की प्रिया मानी जाती है और इसका भोग लगाकर भगवत प्रेमीजन इसका प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। स्वर्ण, रत्न, मोती से बने पुष्प यदि श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाए तो भी तुलसी पत्र के बिना वे अधूरे हैं। श्रीकृष्ण अथवा विष्णुजी तुलसी पत्र से प्रोक्षण किए बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं करते। कार्तिक मास में विष्णु भगवान का तुलसीदल से पूजन करने का माहात्म्य अवर्णनीय है। तुलसी विवाह से कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है साथ ही घर में श्री, संपदा, वैभव-मंगल विराजते हैं।

इस पौधे की पूजा विशेष कर स्त्रियाँ करती हैं। सद गृहस्थ महिलाएं सौभाग्य, वंश समृद्धि हेतु तुलसी- पौधे को जल सिंचन, रोली अक्षत से पूजकर दीप जलाती हुई अर्चना-प्रार्थना कहती है। सौभाग्य सन्तति देहि, धन धान्यं व सदा। वैसे वर्ष भर तुलसी के थाँवले का पूजन होता है, परन्तु विशेष रूप से कार्तिक मास में इसे पूजते हैं। कार्तिक मास में विष्णु भगवान का तुलसीदल से पूजन करने का माहात्म्य अवर्णनीय है।

तुलसी से जुड़ी कथाएँ:-


1) धर्मध्वज की पत्नी का नाम माधवी तथा पुत्री का नाम तुलसी था। वह अतीव सुन्दरी थी। जन्म लेते ही वह नारीवत होकर बदरीनाथ में तपस्या करने लगी। ब्रह्मा ने दर्शन देकर उसे वर मांगने के लिए कहा। उसने ब्रह्मा को बताया कि वह पूर्वजन्म में श्रीकृष्ण की सखी थी। राधा ने उसे कृष्ण के साथ रतिकर्म में मग्न देखकर मृत्यृलोक जाने का शाप दिया था। कृष्ण की प्रेरणा से ही उसने ब्रह्मा की तपस्या की थी, अत: ब्रह्मा से उसने पुन: श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने का वर मांगा। ब्रह्मा ने कहा -- तुम भी जातिस्मरा हो तथा सुदामा भी अभी जातिस्मर हुआ है, उसको पति के रूप में ग्रहण करो। नारायण के शाप अंश से तुम वृक्ष रूप ग्रहण करके वृंदावन में तुलसी अथवा वृंदावनी के नाम से विख्यात होगी। तुम्हारे बिना श्रीकृष्ण की कोई भी पूजा नहीं हो पायेगी। राधा को भी तुम प्रिय हो जाओगी। ब्रह्मा ने उसे षोडशाक्षर राधा मंत्र दिया।

2) महायोगी जांलधर जिन्हे शंखचूड़ नाम से भी जाना जाता है, राक्षस ने महर्षि जैवीषव्य से कृष्णमंत्र पाकर बदरीनाथ में प्रवेश किया। अनुपम सौंदर्यवती तुलसी से मिलने पर उसने बताया कि वह ब्रह्मा की    आज्ञा से उससे विवाह करने के निमित्त वहाँ पहुँचा था। तुलसी ने उससे विवाह कर लिया। वे लोग दानवों के अधिपति के रूप में निवास करने लगे। जब शंखचूड़ का उपद्रव बहुत बढ़ गया तो एक दिन हरि ने अपना शूल देकर शिव से कहा कि वे शंखचूड़ को मार डालें। शिव ने उस पर आक्रमण किया, सबने विचारा कि जब तक उसकी पत्नी पतिव्रता है तथा उसके पास नारायण का दिया हुआ कवच है, उसे मारना असम्भव है। अत: नारायण ने बूढ़े ब्राह्मण के रूप में जाकर उससे कवच की भिक्षा मांगी। शंखचूड़ का कवच पहनकर स्वयं उसका सा रूप बनाकर वे उसके घर के सम्मुख दुंदुभी बजाकर अपनी देवताओं पर विजय की घोषणा किया। प्रसन्नता के आवेग में तुलसी ने उनके साथ समागम किया। तदनन्तर विष्णु को पहचानकर पतिव्रत धर्म नष्ट करने के कारण उसने शाप दिया- "तुम पत्थर हो जाओ। तुमने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने भक्त के हनन के निमित्त उसकी पत्नी से छल किया है।" शिव ने प्रकट होकर उसके क्रोध का शमन किया और कहा- "तुम्हारा यह शरीर गंडक नामक नदी तथा केश तुलसी नामक पवित्र वृक्ष होकर विष्णु के अंश से बने समुद्र के साथ विहार करेंगे। तुम्हारे शाप से विष्णु गंडकी नदी के किनारे पत्थर के होंगे और तुम तुलसी के रूप में उन पर चढ़ाई जाओगी। शंखचूड़ पूर्वजन्म में सुदामा था, तुम उसे भूलकर तथा इस शरीर को त्यागकर अब तुम लक्ष्मीवत विष्णु के साथ विहार करो। शंखचूड़ की पत्नी होने के कारण नदी के रूप में तुम्हें सदैव शंख का साथ मिलेगा। तुलसी समस्त लोकों में पवित्रतम वृक्ष के रूप में रहोगी।" शिव अंतर्धान हो गये और वह शरीर का परित्याग करके बैकुंठ चली गई। कहते हैं, तभी से विष्णु के शालिग्राम रूप की तुलसी की पत्तियों से पूजा होने लगी।

3) श्रीकृष्ण ने कार्तिक की पूर्णिमा को तुलसी का पूजन करके गोलोक में रमा के साथ विहार किया, अत: वही तुलसी का जन्मदिन माना जाता है। प्रारम्भ में लक्ष्मी तथा गंगा ने तो उसे स्वीकार कर लिया था, किन्तु सरस्वती बहुत क्रोधित हुई। तुलसी वहाँ से अंतर्धान होकर वृंदावन में चली गई। इसलिए उन्हें वृन्दा भी कहा गया है। जहां तुलसी बहुतायत से उगती है वह स्थान वृन्दावन कहा जाता है। इसी वृन्दा के नाम पर श्रीकृष्ण की लीलाभूमि का नाम वृन्दावन पड़ा। नारायण पुन: उसे ढूँढकर लाये तथा सरस्वती से उसकी मित्रता करवा दी। सबके लिए आनंदायिनी होने के कारण वह नंदिनी भी कहलाती है।

तुलसी पूजा क्या है और कैसे की जाती है:-


तुलसी पूजा का दिन विष्णु पुराण के अनुसार कार्तिक नवमी / कार्तिक सुदी एकादशी को तुलसी विवाह के रूप में उल्लेख किया है किंतु अन्य धर्म ग्रंथों में प्रबोधिनी एकादशी को शुभ एवं फलदायी बताया गया हैं इसी दिन गोधूली बेला में भगवान शालिग्राम, तुलसी व शंख का पूजन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। लोग इस दिन तुलसी एवं भगवान शालिग्राम का विवाह कर पूजा अर्चना करते है। यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है और मान्यता है कि इस दिन योगेश्वर भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते है और उसके बाद सारे शुभ कार्य करने शुरू किये जाते है। तुलसी विवाह से कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है साथ ही घर में श्री, संपदा, वैभव-मंगल विराजते हैं।

तुलसी की आराधना करते हुए ग्रंथ लिखते हैं-

महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्य वर्धिनी।

आधिव्याधि हरिर्नित्यं तुलेसित्व नमोस्तुते॥

हे तुलसी! आप सम्पूर्ण सौभाग्यों को बढ़ाने वाली हैं, सदा आधि-व्याधि को मिटाती हैं, आपको नमस्कार है। अकाल मृत्यु हरण सर्व व्याधि विनाशनम्॥ तुलसी को अकाल मृत्यु हरण करने वाली और सम्पूर्ण रोगों को दूर करने वाली माना गया है।

रोपनात् पालनान् सेकान् दर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम्।

तुलसी दह्यते पाप वाढुमतः काय सञ्चितम्॥

तुलसी को लगाने से, पालने से, सींचने से, दर्शन करने से, स्पर्श करने से, मनुष्यों के मन, वचन और काया से संचित पाप जल जाते हैं। वायु पुराण में तुलसी पत्र तोड़ने की कुछ नियम मर्यादाएँ बताते हुए लिखा है –

अस्नात्वा तुलसीं छित्वा यः पूजा कुरुते नरः ।

 सोऽपराधी भवेत् सत्यं तत् सर्वनिष्फलं भवेत्॥

 अर्थात् - बिना स्नान किए तुलसी को तोड़कर जो मनुष्य पूजा करता है, वह अपराधी है। उसकी की हुई पूजा निष्फल जाती है, इसमें कोई संशय नहीं।

 तुलसी की पूजा से घर में सुख-समृद्धि और धन की कोई कमी नहीं होती। इसके पीछे धार्मिक कारण है। तुलसी में हमारे सभी पापों का नाश करने की शक्ति होती है। तुलसी को लक्ष्मी का ही स्वरूप माना गया है। विधि-विधान से इसकी पूजा करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और इनकी कृपा स्वरूप हमारे घर पर कभी धन की कमी नहीं होती। कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। इस एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

 अश्वमेध यज्ञ से प्राप्त पुण्य कई जन्मों तक फल देने वाला होता है। यही पुण्य तुलसी नामाष्टक के नियमित पाठ से मिलता है। तुलसी नामाष्टक का पाठ पूरे विधि-विधान से किया जाना चाहिए।

कथा प्रेरक :- बालमुकुन्द  जी शास्त्री  ( किशनगढ़ वाले )

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