कैकेयी - दो वरदान या जग अपमान? क्यों माता कैकेयी ने खुद के लिए अपमान चुना?

दोस्तों आप सभी का स्पिरिचुअल गॉसिप्स टीम की और से हार्दिक अभिनन्दन आज के इस ब्लॉग में हम आपके लिए रामायण के ऐसे पात्र की कहानी, जिसे पढ़कर आपकी उस पात्र के प्रति जो सोच है वह बदल जाएगी और आप उस पात्र से और भी प्रेम करने लगेंगे ! जी हाँ दोस्तों ये पात्र रामायण का काफी घृणित पात्र है पर हम आपको बताना चाहते है की अगर ये पात्र अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से न निभाते तो शायद रामायण नहीं रची जाती और भगवान राम के जीवन का अर्थ सार्थक न होता !

दोस्तों वो पात्र है माता कैकेयी, हमे पता है की आप हमारे मुख से कैकेयी के लिए माता शब्द सुन के हैरान होंगे पर हमे यकीन की हमारा पूरा ब्लॉग पढ़ने के बाद आप भी पापनि, कलंकनी जैसे शब्दों से अपमानित हुई कैकयी को माता कह के सम्बोदित करेंगे ! आइये दोस्तों, तो जानते है विस्तार से माता कैकयी के बारे में...

कैकेयी को भगवान राम को 14 वर्ष वनवास भेजने का और उनके पति राजा दशरथ की मृत्यु का दोषी माना जाता है, कैकेयी ने कैसे आपने वरदानो का उपयोग करके रामायण को एक अमर रूप दिया है !

Keikeiyi


कौन थी माता कैकेयी?

माता कैकेयी, कैकेय देश के राजा अश्वपति की एकलौती बेटी थी, सात भाइयों के अकेली बहिन, सबकी प्रिय, बेहद खूबसूरत, समझदार,अति गुणवान होने के साथ-साथ  युद्ध नीति में भी बहुत कुशल थी ! जी हाँ, राजा अश्वपति वही थे जो पक्षियों की भाषा समझ सकते थे ! कहा जाता है की, एक दिन राजा अश्वपति अपनी पत्नी के साथ बाग़ में भ्रमण पर निकले, बाग़ में हंसों का एक जोड़ा तेज आवाज करने लगा, तब राजा अश्वपति की रानी ने राजा से पूछा की हंस इतने व्याकुल क्यों है और क्या कह रहे है, राजा जानते थे की हंस कह रहे है की अगर ये बात राजा ने रानी को बताई तो राजा की मृत्यु हो जाएगी, इधर रानी भी हठ करे बैठी थी हंसों ने ऐसा क्या कहा जो राजा उन्हें नहीं बता रहे, बात इतनी बढ़ गयी की राजा ने रानी का त्याग कर दिया, और राजकुमारी कैकेयी बचपन में ही अपनी माँ से अलग हो गयी ! कैकेयी की देखभाल के लिए दासी मंथरा को नियुक्त किया गया ! तेज स्वाभाव वाली मंथरा कैकेयी के मन मस्तिष्क में अपनी जगह बनाने में सफल हो गई और आगे चल के इसी घनिष्ठता ने रामायण को रोचक मोड़ दिया !

विवाह पूर्व, कैकेयी ने महर्षि दुर्वासा के सानिध्य में शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया ! दुर्वासा कैकेयी की सेवा से प्रभावित हुए और उन्होंने वरदान स्वरुप कैकेयी का एक हाथ वज्र बना दिया और कहा की कालान्तर में भगवान तम्हारी गोद में खेलेंगे ! समय चक्र आगे बढ़ा और राजा दशरथ का कैकेय देश आना हुआ, कैकेयी ने खुद राजा दशरथ के स्वागत की जिम्मेदारी संभाली, राजा दशरथ कैकेयी के सौंदर्य और कार्य कुशलता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने राजा अश्वपति के सामने कैकेयी से विवाह का प्रस्ताव रखा ! राजा अश्वपति भी सशर्त विवाह के लिए राजी हो गए, और शर्त रखी की कैकेयी से जो भी पुत्र होगा, उसे आयोध्या का उत्तराधिकारी बनाया जायेगा !

राजा दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या का कोई पुत्र नहीं था तो उन्होंने यह वचन दे दिया ! वचन देने के बाद अयोध्या के राजा दशरथ से कैकेयी की शादी हो गई, किन्तु शादी के बाद वे भी माँ ना बन सकी ! इसके बाद राजा दशरथ की शादी सुमित्रा से हुई, जो कि काशी के राजा की पुत्री थी ! किन्तु, वे भी माँ नहीं बन सकी और फिर परिणाम यह निकला कि राजा दशरथ पिता नहीं बन सकते थे ! राजा दशरथ के कोई भी पुत्र न होने कारण वे बहुत दुखी रहने लगे | इसके लिए महर्षि वशिष्ठ से प्रार्थना कि गयी, महर्षि वशिष्ठ ने इसके लिए महर्षि श्रृंगी  के द्वारा एक यज्ञ का आयोजन करने कि प्रार्थना कि जिससे बाद रानी कौशल्या को सबसे बड़ा पुत्र राम हुए और रानी कैकेयी को पुत्र भरत हुआ और फिर रानी सुमिन्त्रा को 2 पुत्रों की प्राप्ति हुई जो लक्ष्मण और शत्रुघ्न कहलाये !  इस तरह राजा दशरथ को चार पुत्रों की प्राप्ति हुयी !  कैकेयी राम को अपने पुत्र भरत से भी अधिक प्रेम करती थी ! 

आईये जानते है की माता कैकेयी को कैसे 2 वरदानो की प्राप्ति हुयी ?


माता कैकेयी राजा दशरथ के सर्वाधिक निकट थी, इसका कारण केवल उनका अनन्य सौन्दर्य ही नहीं था, बल्कि युद्ध कला में भी वह माहिर थीं !  इसका उदाहरण तब मिलता है जब वह राजा दशरथ के साथ देवराज इंद्र को  सहयोग देने युद्ध भूमि गयी थीं ! 

एक बार देवराज इंद्र सम्बरासुर नामक राक्षस से युद्ध कर रहे थे, किन्तु वह राक्षस बहुत ही बलशाली था !  उसका सामना कोई भी देवता नहीं कर पा रहे थे !  ऐसे में वे राजा दशरथ के पास सहायता के लिए गए !  तब राजा ने उन्हें सम्बरासुर से युद्ध करने के लिए आश्वाशन दिया और वे युद्ध के लिए जाने लगे, तभी रानी कैकेयी ने भी उनके साथ जाने के लिए इच्छा जताई !  राजा दशरथ भी रानी कैकेयी को अपने साथ युद्ध में ले गये !  युद्ध की शुरूआत हुयी और युद्ध के दौरान एक बाण राजा दशरथ के सारथी को लग गया, जिससे राजा दशरथ थोड़े से डगमगा गए ! 

तब रथ की कमान रानी कैकेयी ने सम्भाली, वे राजा दशरथ की सारथी बन गई, इसी के चलते उनके रथ का एक पहिया गढ्ढे में फंस गया !  सम्बरासुर लगातार राजा दशरथ पर वार कर रहा था | जिससे राजा दशरथ बहुत अधिक घायल हो गए!  यह देख रानी ने रथ में से उतर कर जल्दी से रथ के पहिये को गढ्ढे से बाहर निकाला और खुद ही युद्ध करने लगी, वह राक्षस भी उनके पराक्रम को देखकर भयभीत हो गया और वहाँ से भाग गया और इस तरह रानी कैकेयी ने राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की ! राजा दशरथ भी रानी कैकेयी से बहुत प्रभावित हुए उन्होंने रानी कैकेयी को अपने 2 मनचाहे वरदान मांगने को कहा ! रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से कहा कि – “आपके प्राणों की रक्षा करना यह तो मेरा कर्तव्य है.” किन्तु राजा ने उन्हें फिर भी वरदान मांगने को कहा, रानी ने कहा कि –“अभी मुझे कुछ नहीं चाहिए इन 2 वरदानों की आवश्यकता भविष्य में जब कभी पड़ेगी तब मैं मांग लूँगी” तब राजा दशरथ ने उन्हें भविष्य में 2 वरदान देने का वादा कर दिया !

अब बात करते है उन्ही दो वरदानो की 

कहा जाता है, कैकेयी के विवाह पूर्व, एक दिन राजा दशरथ की बात चली, तो राजा अश्वपति के राजपुरोहित रत्नऋषि जो श्रवण कुमार के पिता थे, ने ज्योतिष गणना के आधार पर बताया की राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात अगर राजगद्दी पर कोई भी संतान बैठी तो रघुवंश का नाश हो जायेगा | ये बात बाकी सभी लोगो के लिए तो आयी गयी हो गयी परन्तु ये बात माता कैकेयी के ह्रदय  में बैठ गयी और विवाह के पश्चात भी कैकेयी के जहन में रही !

जब राजा दशरथ ने श्री राम को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और राजतिलक की तैयारी करने को कहा गया , तभी बुद्धिमती कैकेयी को राजपुरोहित की बात स्मरण हुई, उन्होंने निश्चय कर लिया की मैं अपने प्रिये पुत्र श्री राम को रघुवंश के विनाश का कारण नहीं बनने दूंगी !

इसके अलावा कैकेयी के चरित्र के सन्दर्भ कोई राय बनाने के पूर्व देवताओ और माता सरस्वती की भूमिका पर भी तो विचार किया जाना चाहिए ! यह प्रसंग रामायण का थोड़ा भी ज्ञान रखने वालो को सबको ज्ञात है ! श्रीराम के राज्याभिषेक की बात सुन सारे देवता चिंतित हो गए, और उन्होंने सोचा की अगर राम राजा बन गए तो राज-काज और भोग विलास में ही उनका जीवन कट जायेगा, जबकि श्रीराम का जन्म बुराई का विनाश करने के उद्देश्य से हुआ था, वो व्यर्थ जायेगा तभी सभी देवताओ ने मिलकर ये सारा षड़यंत्र रचा !

वरना आप ही सोचिये, इतनी ज्ञानवान और गुणवान और राम को भरत से अधिक प्रेम करने वाली कैकेयी कुटिल मंथरा के बहकावे में कैसे आ गयी ?

राम के वन गमन के पश्चात भी कैकेयी भरत के लिए भी यही चाहती थी, की वह राजसिंहासन पर बैठ कर राज्ये का संचालन न करे और यही हुआ | भरत ने राजकार्ये तो संभाला लेकिन राजसिंहासन धारण न कर सिंहासन पर श्री राम की चरण पादुका स्थापित कर राज्य का शासन कुश के आसन पर बैठ कर संचालित किया !

संत का मानना है की राम के 14 साल के वनवास की अवधि में एक भी मौत नहीं हुई !

ऐसी परिस्थिति से घिर कर ही तो कैकेयी को दो वरदान मांगने पड़े जिनके चलते वह हर काल और युग में एक कलंकिनी के रूप में ही परिभाषित होती रही और अपने खुद के पुत्र से अपमानित होना पड़ा !

भरत ने अपनी माता के प्रति अति कटुवचन कहे, उनको भी कैकेयी रघुवंश की सुरक्षा के लिए सहन कर गयी !

जब चित्रकूट में, भरत ने माता कैकेयी की निंदा करते हुए उन्हें कुबुद्धि कहा , तब भगवान राम ने भरत को माता कैकेयी की कठोर निंदा करने से रोकते हुए कहा

"दोषु देहि जननिहि जड़ तेई, 
जिन्ह गुरु साधु सभा नहीं सेई" 
अर्थात:
माता कैकेयी को वही मुर्ख दोष दे सकते है, जिन्होंने गुरु और साधुओ की सभा का सेवन नहीं किया हो !

श्री रामचरित्रमानस का गहन अध्ययन करने वालो का कहना है की कैकेयी निंदनीय है या प्रसंशनीय ये कहना बहुत मुश्किल है ! क्योंकि माता कैकेयी की प्रशंसा करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम राम कभी गलत नहीं हो सकते और दूसरी तरफ कैकेयी की निंदा करने वाले भाई भरत के चरित्र को इस तरह बुना है की वो गलत नहीं लगते !

मगर रामायण में रची परिस्थितयों को ऊपर से देखा जाये तो कैकेयी निंदनीय लगती है लेकिन दो वरदानो का परिणाम देखे तो माता कैकेयी वन्दनीये ही लगती है !

!! जय श्री राम !!

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