जानिए उर्मिला और लक्ष्मण के त्याग और समर्पण की कहानी ! Laxman Aur Urmila

Laxman Aur Urmila

क्या आपको पता है क्यों लक्ष्मण 14 वर्ष के वनवास में एक पल भी नहीं सोये? रामायण में क्या बलिदान लक्ष्मण और उनकी पत्नी उर्मिला ने दिए? कैसा प्रेम था राम और लक्ष्मण के बीच ? क्या वरदान माता सीता ने अपनी अनुजा उर्मिला को दिया ?

तो आइये दोस्तों जानते है रामायण के ऐसे दो पात्रो के बारे में जिनके बलिदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता ! रामायण को आजतक हमने अपने और इस समाज ने एक ही दृष्टिकोण से देखा। जब हम  रामायण की बात करते है तो हमारा शीश मर्यादा पुरषोतम श्रीराम और माता सीता के आदर में झुक जाता है, और भाइयों का जहाँ जिक्र होता है तो हमे भरत याद आते है|

मगर हम आपको यह बताना चाहते है की उर्मिला और  लक्ष्मण का जीवन, बलिदान, त्याग और समर्पण की एक मिसाल है और आज की पीढ़ी के लिए उन दोनों का व्यक्तित्व सम्माननीय और पूजनीय होना चाहिए !

कहा जाता है की, जन्म के बाद, राम, भरत और शत्रुघ्न सामान्य शिशुओं की तरह थोड़ी देर रोकर की चुप हो गए, परन्तु  लक्ष्मण रोते ही रहे, पर जैसे ही उन्हें राम के बगल में लेटाया, उन्होंने रोना बंद कर दिया ! तब से ही लक्ष्मण राम की परछाई बन कर रहते है !

जब पिता के आदेश से श्री राम, माता सीता सहित वन की ओर प्रस्थान कर रहे तब लक्ष्मण ने भी अपने अग्रज प्रभु राम के साथ वन में जाने का निर्णय ले लिया ! लक्ष्मण  जी की पत्नी ने भी उनके साथ वन चलने का आग्रह किया किन्तु लक्ष्मण ने यह कह के मना कर दिया की वे वन भाई और भाभी की सेवा करने जा रहे है ! उर्मिला बोली की लक्ष्मण भाई भाभी की सेवा अवशय करे और वे तो अपने पति की सेवा करने उनके साथ वन जाएँगी ! लक्ष्मण ने तब उर्मिला को समझाया की श्री राम और सीता के जाने से राज्य और घर वालो को सँभालने की सारी जिम्मेदारी उन्ही की है और कहा - माता सीता के पीछे से  तुम्हे ही पूरे परिवार, सभी माताओ और पिता श्री का ध्यान रखना है !

उर्मिला को आपने पति की आज्ञा का पालन करने के आलावा और कोई विकल्प नज़र नहीं आया सो उन्होंने दुखी मन से सहमति तो दे दी पर उर्मिला बड़ी उलझन में पड़ गयी, की बिना पति और बड़ी बहन के वो पूरे परिवार की जिम्मेदारी अकेले कैसे संभालेंगी ! तत्काल वे अपनी बड़ी बहन माता सीता के पास गयी आपने मन की बात कही, तब माता सीता ने समझाया की वे अकेली सब कर सकती है, जिसकी अपेक्षा उनसे की जा रही है ! माता सीता ने अपना एक वरदान भी उर्मिला को दिया जिसमे वे एक साथ तीन काम कर सकती है और कहा की यह वरदान तुम्हे प्रजा और परिवार की सेवा करने में काफी सहायक होगा !

वनवास जाते समय लक्ष्मण ने उर्मिला से एक वचन भी लिया, की वे उनके पीछे से कभी भी आंसू नहीं बहाएंगी,क्यूंकि लक्ष्मण जी का मनना था की अगर वह अपने दुःख में डूबी रहेंगी तो परिजनों का ख्याल नहीं रख पाएंगी। सोचिये अपने पति को 14 वर्षों के लिए दूर जाने देना और उसकी विदाई पर आंसू भी न बहाना किसी नवविवाहिता के लिए कितना पीड़ादायक हो सकता है? उर्मिला ने महाराज दशरथ के स्वर्ग सिधारने पर भी एक आंसू नहीं बहाया !

यह सब होने के बाद, उर्मिला के पिता उन्हें मायके अर्थात मिथला ले जाने के लिए आये, ताकि माँ और सखियों के सानिध्य में पति वियोग का एहसास कम होगा, परन्तु उर्मिला ने यह कहते हुए माना कर दिया की अब पति के परिजनो के साथ रहना और उनका दुःख बाँटना ही उसका धर्म है! यह सब बातें हमे बताती है की उर्मिला कितनी बड़ी पतिव्रता थी !

 


 दोस्तों रामायणकाल में जितनी तपस्या उर्मिला ने की थी उससे कही ज्यादा तप लक्ष्मणजी ने किया था आईये दोस्तों जानते है की आखिर कैसे लक्ष्मणजी ने 14 वर्ष प्रभु श्रीराम की सेवा और तपस्या करते हुए गुजारे।

एक बार रामजी के राजयतिलक के उपरांत अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया।

भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥ अगस्त्य मुनि बोले- श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥

उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और  उन्हें बांधकर लंका ले आया था॥ ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥ लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥ श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥ फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥

अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था …..

(1) जो चौदह वर्षों तक न सोया हो,
(2) जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और
(3) जिसने चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥

इस पर प्रभु श्रीराम ने कहा,   वनवास काल में चौदह वर्षों तक मैं नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल उसे देता रहा॥ मैं सीता के साथ एक कुटीया में रहता था, बगल की कुटीया में ही लक्ष्मण रहते थे, फिर भी लक्ष्मण ने सीता का मुख न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥ अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥

प्रभु से कुछ छुपा है भला! दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥ अगस्त्य मुनि ने कहा – क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥ लक्ष्मणजी आए प्रभु श्री राम ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा॥

प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?, फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?, और 14 साल तक सोए नहीं ? यह कैसे हुआ ?

लक्ष्मणजी ने कहा - भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥ आपको स्मरण तो  होगा की मैं  सिवाए उनके पैरों के नुपूर के, कोई और आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं।

चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए – आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे। मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था। निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था।

निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥ आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था।

अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे! एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥ आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उन्हें खाता कैसे? मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥ सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥

प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥ प्रभु ने कहा- इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?

लक्ष्मणजी ने सात दिनों के फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं

1–जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे

2–जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता

3–जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे,

4–जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,

5–जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक में रहे,

6–जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी,

7–और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥ इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी

विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया।

भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया।

उर्मिला ने भी आपने पति को अपना कर्तव्य पूरा करने में मदद की और अपनी ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण 14 वर्षो का बलिदान दिया !

एक अन्य कथा, जिसका वर्णन रामचरित्र मानस में सीधे सीधे नहीं किया गया है के अनुसार लक्ष्मण की विजय का कारण उनकी पत्नी उर्मिला का पतिव्रत धर्म था ! मेघनाद के वध के बाद जब उनका शव श्री राम के युद्ध शिविर में रखा था और जब मेघनाद की पत्नी सुलोचना शव लेने आयी तब आपने पति के शव को छलनी हुआ देख बड़ी व्यथित हो उठी और लक्ष्मण से बोली - सुमित्रानंदन, आप भूल के भी मेघनाद के वध का गर्व मत करना, ये तो दो पतिव्रता नारियो का भाग्य था !

उर्मिला और लक्ष्मण के  दो पुत्र अंगद एवं चंद्रकेतु और 1 पुत्री सोमदा हुई ! अंगद ने अंगदिया पूरी और चंद्रकेतु ने चंद्रकेतु पूरी की स्थापना की थी !

इस तरह हमे लक्ष्मण और उर्मिला से आपने परिवार के प्रति समर्पण और त्याग की शिक्षा मिलती है ! रामायण केवल प्रभु श्री राम के त्याग से ही सार्थक नहीं हुई बल्कि इसका हर एक पात्र खुद में  त्याग की एक कहानी समेटे हुए है !



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