क्यों महाभारत में अंधे धृतराष्ट्र को युद्ध का दोषी माना गया | Dhritarashtra

 कैसे हुआ धृतराष्ट्र का जन्म? क्यों वे बचपन से ही अंधे थे? क्या धृतराष्ट्र ने अपनी पत्नी गांधारी के परिवार का नाश किया? कैसे महाभारत युद्ध के जिम्मेदार धृतराष्ट्र ही थे? दोस्तों ऐसे ही रोचक सवालों के रोचक उतर है हमारे आज के इस अंक में? सभी सवालों के उतर जानने के लिए यह अंत तक जरूर पढ़े !

Mahabharat


दोस्तों महाभारत ग्रन्थ अपने आप में बहुत से रहस्य समेटे हुए है! आप जितना इससे पढ़ेंगे उतना है और जानने की इच्छा आपके मन में उत्पन्न होगी ! आज हम आपको बताएँगे महाभारत के एक अनोखे और अद्भुत पात्र के बारे में, वो पात्र है महाभारत में कौरव कहलाने वाले दुर्योधन के पिता, महाराज धृतराष्ट्र !


ब्रह्मा जी के एक श्राप के कारण देवी गंगा और शांतनु को पृथ्वीलोक पे जन्म लेना पड़ा था ! कुरु राजा शांतनु और देवी गंगा को एक पुत्र हुआ जिसे देवव्रत कहा गया !  देवव्रत ने जब आजीवन ब्रह्मचर्य रहने की प्रतिज्ञा ले ली तब उन्हें भीष्म कहा जाने लगा और आगे चलकर भीष्म पितामह कहलाये ! यह तो सभी जानते हैं कि इस प्रतीज्ञा के पीछे शांतनु की दूसरी पत्नी निषाद कन्या सत्यवती का हाथ था। सत्यवती चाहती थी कि उसके ही पुत्र राजगद्दी पर बैठे। सत्यवती जब कुंवारी थी तब उसको एक पुत्र हुआ था जिसका नाम वेद व्यास था। जो आगे चल के महृषि वेदव्यास कहलाये ! फिर शांतनु से सत्यवती को दो पुत्र हुए। जिनका नाम था विचित्रवीर्य और चित्रांगद


चित्रांगद बहुत ही कम उम्र में एक युद्ध लड़ते हुए मारे गए थे। इसके बाद पितामह भीष्म ने विचित्रवीर्य का विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका और अंबालिका से करवाया था। विवाह के कुछ समय बाद ही बीमारी के कारण विचित्रवीर्य की भी मृत्यु हो गई। अभी तक विचित्रवीर्य की पत्नी अंबिका और अंबालिका संतानहींन थी। इस बात को लेकर माता सत्यवती के मन में बहुत ही ज्यादा चिंता उत्पन्न हो गयी कि अब कौरव वंश आगे कैसे बढ़ेगा?


तब माता सत्यवती ने अपने कौरव वंश को आगे बढ़ाने के लिए अपने पुत्र वेद व्यास को बुलवा भेजा। महर्षि वेदव्यास जी को जब अपनी माता सत्यवती के आमंत्रण की सूचना मिली तो वह तुरंत ही अपनी माता सत्यवती के सामने उपस्थित हो गए। और माता से बुलाने का कारण पूछा। तब सत्यवती ने वेदव्यास  से कौरव वंश को आगे बढ़ाने का उपाय पूछा? अपनी माता की आज्ञा का पालन करते हुए, व्यास मुनि विचित्रवीर्य की दोनों पत्नियों के पास गए और अपनी यौगिक शक्तियों से उन्हें पुत्र उत्पन्न करनें का वरदान दिया। उन्होंने अपनी माता से कहा कि वे दोनों रानीयों को एक-एक कर उनके पास भेजें और उन्हे देखकर जो जिस भाव में रहेगा उसका पुत्र वैसा ही होगा। तब पहले बड़ी रानी अंबिका कक्ष में गईं और फिर छोटी रानी अम्बालिका गई, पर अम्बिका ने उनके तेज से डरकर अपने नेत्र बंद कर लिए जबकि अम्बालिका वेदव्यास को देखकर भय से पीली पड़ गई। वेदव्यास लौटकर माता से बोले, 'माता अम्बिका को बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किंतु नेत्र बंद करने के दोष के कारण वह अंधा होगा जबकि अम्बालिका के गर्भ से  रोग से ग्रसित पुत्र पैदा होगा।'


यह जानकर के माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जाकर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आकर कहा, 'माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदांत में पारंगत अत्यंत नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।' इतना कहकर वेदव्यास तपस्या करने चले गए।


अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और दासी से विदुर का जन्म हुआ। तीनों ही ऋषि वेदव्यास की संताने कहलायी थी।बचपन में धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के पालन पोषण का भार पितामह भीष्म पर था। जब यह तीनों बड़े हुए तो इन तीनों को विद्या अर्जित करने के लिए पितामह भीष्म ने इन्हें गुरुकुल भेज दिया। गुरुकुल में विद्या अर्जित करते हुए। धृतराष्ट्र बल विद्या में श्रेष्ठ हुए, पांडु धनुर्विद्या में श्रेष्ठ हुए, और विदुर धर्म और नीति में पारंगत हो गए। जब धृतराष्ट्र पांडु और विदुर बड़े हुए तो कौरव वंश का राजा पांडु को बनाया गया। क्योंकि धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे। और विधुर एक दासी के पुत्र थे। इसलिए उन्हें राजा नहीं बनाया जा सकता था। एक युद्ध में राजा पांडु के मौत के बाद धृतराष्ट्र को कौरव-वंश का राजा बनाया गया


एक अन्य कथा के अनुसार, धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म में बड़े राजा थे !  एक बार उनके ही राज्य के एक ब्राह्मण दम्पति ने अपनी तीर्थयात्रा हेतु अपनी संतान के सामन प्रिय अपने हंस के जोड़े को उनके चार बच्चों सहित राजा के संगक्षण में छोड़ गए, तब राजा ने हंस के बच्चों को अभी जिव्हा के स्वाद के लिए भुनवा के खा लिया, इस प्रकार हंसो के अलग अलग समय में सौ संताने हुई, राजा सभी बच्चों को भुनवा के खा गए ! अंततः हंसो का जोड़ा संतानहीन होने के दुःख से मर गया ! कई वर्षो बाद ब्राह्मण दम्पति तीर्थ से लौटे तो राजा ने उनसे झूठ बोल दिया की हंस तो बीमार होकर मर गए ! ब्राह्मण दम्पति को राजा पर पूरा भरोसा था, वे उनकी बात मान कर विलाप करते हुए चले गए ! प्रजा की धरोहर के प्रति लालच और विश्वासघात जैसे कर्मो का दंड धृतराष्ट्र को अपने अगले जन्म में भुगतना पड़ा !


राजा बनने के बाद, पितामह भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से कराया था ! यह विदित है की विवाह पूर्व गांधारी को नहीं मालूम था की उनके होने वाले पति जन्म से अंधे है ! विवाह बाद जब गांधारी को ये ज्ञात हुआ तो उन्होंने भी अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली और सारा जीवन एक नेत्रहीन की तरह गुजर दिया !


कहा जाता है की महाराज धृतराष्ट्र ने गांधारी के सभी  परिवारजन की हत्या करवाई थी! गांधारी से विवाह के बाद जब महाराज धृतराष्ट्र को पता चला की कुंडली दोष के कारण गांधारी का विवाह एक बकरे से हुआ था और बाद में उस बकरे की बालि दे दी गयी थी !  ये बात धृतराष्ट्र और गांधारी के विवाह के समय छुपाई गई थी। जब धृतराष्ट्र को गांधारी की इस बात का पता चला तो महाराज धृतराष्ट्र को अपने ससुर अर्थात गंधार नरेश सुवाला और उनके सौ पुत्रों पर बहुत ज्यादा गुस्सा आया। और उन्होंने गांधार नरेश सुबाला और उसके सौ पुत्रों को कारावास में डालकर बहुत यातनाएं देने की आदेश दे दी। वह उन्हें सिर्फ एक मुट्ठी चावल खाने को देता जिसके कारण एक एक कर सुबाला के सारे पुत्रों की मृत्यु हो गयी। किन्तु उसका सबसे छोटा पुत्र शकुनि जीवित था क्योंकि सुबाला ने उसे धृतराष्ट्र से अपना प्रतिशोध लेने के लिए तैयार किया था इसी कारणवश वह अपने और अपने सारे पुत्रों के हिस्से का चावल शकुनि को दे देते ताकि वह जीवित रहकर अपना बदला ले सके। यही नहीं सुबाला ने शकुनि को यह आदेश दिया कि उसके मृत्यु के पश्चात शकुनि उसके रीढ़ की हड्डी का पासा बनवाये। जब सुबाला अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था तब उसने धृतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की बिनती की जो उसने मान ली और शकुनि को आज़ाद कर दिया।


बाद में शकुनि और उसके पिता की रीढ़ की हड्डी से बना पासा ही कौरवों के नाश का कारण बना।


धृतराष्ट्र अंधे थे लेकिन जब उन्हें ये पता चला की गांधारी को सौ संतानों को जन्म देने का वरदान प्राप्त है तो उन्हें अंधेपन का जो दुःख था वो मिट गया था ! धृतराष्ट्र  को गांधारी से 99 पुत्र और एक पुत्री थी ! गांधारी जब गर्भवती थी तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ इच्छापूर्ति से युयुत्सु नामक पुत्र था ! जिससे मिला कर धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए ! युयुत्सु अंत में कौरवो का साथ छोड़, पांडवो के पास चले गए थे !


भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का जो सन्देश दिया था  उसे अर्जुन के अलावा संजय और धृतराष्ट्र  ने भी सुना था ! उसमे भगवान ने कहा था की सब कुछ पूर्वनिर्धारित है ! सबको उनके पूर्व के कर्मो का दंड भोगना होगा, यह बात धृतराष्ट्र  को स्मरण थी ! दुर्योधन और दु:शासन मुख्य रूप से पांडवो और द्रौपदी के दोषी थे ! उनकी दुर्दशा धृतराष्ट्र  उनके कर्मदंडो से जोड़ रहे थे परन्तु उनके बाकी पुत्रो का क्या दोष थम ये प्रश्न धृतराष्ट्र के मन में बार बार उठ रहे थे ! यह बात धृतराष्ट्र ने महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण से पूछी !


तब केशव ने बताया - राजा और समर्थवान लोगो को कर्मो का दंड विशेष रूप से भोगना पड़ता है ! ईश्वर उन्हें समर्थवान बनाते है तो उनसे ज्यादा जिम्मेदार होने की भी आशा करते है ! महाराज ने राजधर्म का पालन नहीं किया और लोगो के साथ विश्वासघात किया !

केशव बोले - सबसे बड़ा पाप है विश्वासघात और आप उसी का फल भोग रहे है !

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